Sunday, 28 December 2014

वो उठ कर बैठ गए
मैं बैठ कर खड़ा रहा
सवाल जैसा पड़ा रहा
 वो सिंहासन में जड़े रहे
मैं फूटपाथ में जड़ा रहा
यही कि जिंदगी चलती है
दिल में इतनी मचलती है
हंसी कही आँसुओं में पिघलती है
दर्द आह के साथ निकलती है
सपनों के साथ जलती है
अपने घरों में पराये सपने
या पराये घरों में अपने बनाये सपने
क्यों बुनियाद से टकराते है
रोते हुए मुस्कराते है
फलीभूत कर्मों के फल
कुछ ज्यादा सड़ा कर खाते है
मात्र दुर्गन्ध बनकर रह जाते हैं
अनिल कुमार शर्मा  २९/१२/२०१४

Friday, 26 December 2014

यह अजीब प्रयत्न है
मेरा देश भारत है
और उसमे भारत रत्न है
कुछ मुर्दे है कुछ जिन्दे है
कुछ चोंच वाले है
कुछ पर कटे परिंदे है
अब हताश जिंदगी के उदास सवाल
कब्र सजाकर अभिभूत है
सत्ता के सन्दर्भ में
वर्तमान में कुछ भूत है
भविष्य का सबूत है
मृतप्राय वर्तमान के जीवंत अतीत
प्रतिमान के प्रश्न में
 मूल्यबोध का रूपांतरण
 संदिग्ध आयाम के उत्तर में
एक अनरवत प्रश्न गढ़ रहा है
 जिसे बदलते समय के साथ
 बदलता समय पढ़ रहा है
अनिल कुमार शर्मा 26/12/2014

Wednesday, 10 December 2014

Politics is always wrong my friend
Whether we consider or appease it
It may theocracy or aristocracy
Or monarchy to democracy befit
We all have faults to proceed
Something ideal something deceive
Much was said less was done
Dream and desire mingle with pun
What is state of the state
Ensnared in a confused net
Public is for and against the  public
Power emerges out of tat and tit
Shining crown diminishing to dust
Up the phoenix of plenty lust
Hover ,hover and hover
Uncanny treasure trover
Misguiding misguided to the misguiding lot
In a society full of crime and tort
Black and white, white and black
Comes and goes sack after sack
Lo! they come with polished dream
What was lost to redeem
Always wrong is being corrected with wrong
Little pleasure greater dong.
Anil Kumar Sharma
11/12/2014


Friday, 28 November 2014

लाल रंग में जितनी सफेदी है
उतने आप हमारे है
विशुद्ध चिंतन के आयाम
दर्द और आह्लाद से परे
शुचिता के केंद्र में
अंतहीन सुनिश्चित प्रवाह में
बदलते शब्दार्थ के प्रतीक बिम्ब
अर्थ के बाद भी अर्थ की आवृत्तियाँ
उत्तर के बाद भी उत्तर की तलाश में
पुनः प्रश्न बनकर खड़ा है
चिंतन की चिंतन धारा
प्रश्न उत्तर ,उत्तर फिर प्रश्न
मुखर प्रतिवाद मूक संवाद
गंभीर प्रश्न सुमेरु पर
आच्छादित्त धुंध में
तलाश है एक प्रकाश बिंदु की
तलाशना ही जिसकी सार्थकता है
इन्ही प्रश्न चिन्हों पर प्रश्न उठाते हुए
उत्तर पुनः प्रश्न बन जाते है
प्रारम्भ और अंत के मध्य
अवशेष का सृजन
पुनः वही प्रारम्भ और अंत है
जो अपनी परिणति में अवशेष रह जाता है
युग की संवेदना में जिसे ढूंढते हुए
रिक्त फलक पर शून्य का  हस्ताक्षर
तमाम रंगो की जटिलता में
दृष्टिगोचर हो रहा है
विचारबद्ध उत्तर की पृष्टभूमि पर
पुनः प्रश्न बन कर खड़ा हूँ
शव साधना का नया अर्थ विस्तार
क्या आने वाले युग का उत्तर बन सकेगा ?
काल वंचित अवशेष की व्याख्या में
काल कवलित परिभाषाओं के दायरे
क्या दे पाएंगे अवशेष प्रश्नों के उत्तर ?
बिम्ब को तोड़ते हुए बिम्ब
प्रश्न उत्तर की तरह सामानांतर खड़े है
मध्य के व्याख्यान में अतीत होते हुए
हम और आप पड़े है
अनिल कुमार शर्मा  २८/११/२०१४/


Saturday, 22 November 2014

अब तो  अजीब संत है
जो समस्या अनंत है
भगवान टोकरी में है बोरे में है
भक्त अन्धविश्वास के डोरे में है
बहुत कुछ पाखंड में पगे
सद्वचन के ढिढोंरे में है
सद्वाक्य ओढ़ कर कसाई
भेड़ पालता है
उसे जबह करने के लिए
उपदेश भरा चारा डालता है
झाशाराम है ठगीशंकर है
बम है बन्दुक है बंकर है
व्याख्या में आदिगुरु कोई शंकर है
ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या है
शिष्य से ज्यादा शिष्या है
विलासिता में सजी तपस्या है
अब गुरुघंटाल कानून से ऊपर है
यह तकनीकी बड़ी सुपर है
जनता भक्त है
बाबा और नेता के आगे
अशक्त है
भगवान बेचनेवाले
सत्ता से सशक्त है
मार खाते भोले भाले भक्त है
पाखंड से धर्म अशक्त है
अनिल कुमार शर्मा
22/11/2014

Monday, 3 November 2014

यह हिंदी  मुझसे बात करती है
जैसे सास और ननद मिलकर
नयी  बहू से घात करती  है
बहू की सुरीली गीत
नयी नवेली  प्रीत
पिया मिलन की रात
नयी तरह की बात
हिंदी सास ननद को खटकती है
मंच पर माथा पटकती है
 रिश्तों की डोरी चटकती है
कविता की मंडी में मंदी है
तमाम तरह की गोलबंदी है
फिर भी कुछ जुगलबंदी है
एक बूढ़ा  अपनी हड्डी बजाता है
कुसुमित कपोलों पर कंकाल घुमाता है
समय खायी जीभ मोहर है
हिंदीवाला गाता सोहर है
बहू की निकलती  आह है
यह कैसी  सौतिया डाह है
अनिल कुमार शर्मा
04/11/1972

Sunday, 2 November 2014

विसर्जित आदर्शो से प्रदूषित नदी
परम्पराओं की नेकी- बदी
खुलती ढोल की पोल है
इतिहास से भागा हुआ
एक विचित्र भूगोल है
अब ज़मीन को आसमान से देखते है
अजीब आंकड़े फेकते है
यह तो नया परिवेश है
सिर्फ निवेश है निवेश है
सिर्फ बेचो खरीदो का सन्देश
इसी रास्ते पर अपना देश है
 पानी बोतल में है
जमीन  होटल में है
जिंदगी मॉल में है
जो बची -खुची है
मौत के जाल में है
बहुधन्धी कारोबार है
विचित्र रोजगार है
बूढ़ा बेकार है
पाता पगार है
युवा बेरोजगार है
अपनी सरकार है
शिक्षा संविदा पर है
विभाग खाली है
देश में एक  खाई है
बहती जिसमे नाली है
सपने दिखने के बाद भी
अभी सपनों की जगह खाली है
अनिल कुमार शर्मा ०३/११/२०१४

Saturday, 1 November 2014

What is first and what is last
Tell my life to apparent death
For my atheism and utter faith
I am a story among so many stories
Of men who born and dead
With bright glory and fade death
 Anil Kumar Sharma 02/11/2014



Sunday, 26 October 2014

कटोरे में खड़ी जनता
कटोरे में से कटोरा चुनती है
चुना हुआ कटोरा घूमता है
निवेश के चकाचौंध धुप में
सपनों को भूनता है
नफा नुकसान गुनता है
हरे खेत को बंजर बना दो
फिर किसी कंपनी को थमा दो
व्यापार ही  विकास है
प्रगति का आत्मप्रकाश है
राष्ट्रीय बहुराष्ट्रीय में बिक रहा है
कंपनी के प्रचार से
अंतर्निहित भ्रष्टाचार से
भिखमंगे की कटोरे वाली जनता में
यह कटोरा टिक रहा है
रेशमी लिबाश में दिख रहा है
बात बनाता है बात पकाता है 
निवेश का आयातित नमक मिलाकर
बात के भूखे लोंगो  बात खिलाता है
बात के दो घूंट पिलाता है
बात बड़ी यह है कि
वह अपनी बात जिलाता है
अनिल कुमार शर्मा ७२/१०/२०१४



Friday, 3 October 2014

किसके कितने हो गांधी जी
बहती राजनीति की आँधी जी
कोई झाड़ू है कोई भूखा है
कोई गीला है कोई सुखा है
कोई स्वदेशी है कोई खादी जी
किसके कितने हो गांधी जी
अन्ना के भूखे अनशन हो
स्वदेशी योग -नर्तक के हो
आप के स्वराजी टोपी हो
 मोदी के स्पेशल  झाड़ू हो
लगे रहो मुन्ना भाई के
तेवर बड़े जुझारू हो
इरोम शर्मीला के मांझी जी
किसके कितने हो गांधी जी
सत्य अहिंसा चरखे से हटकर
लकदक पोशाकों में अब
बातचीत के तेवर में
संकेत मात्र हो गांधी जी
किसके कितने हो गांधी जी
अनिल कुमार शर्मा
02/10/2014



Monday, 22 September 2014

अमलतास की खिली कली सी
पीली सरसों के फूलों सी
पंकज पंखुरियों के अधरों में
मुक्ता माला की दन्तावलियां
कुछ बिहस रहे रस भींगे से
मोहक मधुर रंग  राग भरे
मन   मयूर नाच रहा है
अतिशय आनंदित अनुराग भरे
मधुघट सी मदहोश प्रिये
 नयनों के दो प्यालों   से
काले केशों के व्यालों से
विष  आहत   कर   देती हो 
मैं मुर्क्षित तेरे आकर्षण में
हर पल खींचता  आता हूँ
प्रकृति तुम्हारी माया में
पाशबद्ध जी जाता हूँ
अनिल कुमार शर्मा 23/09/2014



 




 
 

Friday, 12 September 2014

शब्दों में कुछ अर्थ पहन कर
विचित्र अंदाज़ में इतराता हूँ
अनर्थ की मेड़ पर
मुरझाये पुष्प की तरह  छितराता  हूँ
जड़ से  लेकर पत्ती तक
ध्वनि चित्र बनाता हूँ
समीर समेटे तेरे कर्णपटह तक आता हूँ
 दोस्त  अपने अंदाज़ में कुछ गाता हूँ
महक उतनी नहीं है जितनी चाहिए
जिससे कि मिज़ाज़ खुशनुमा हो
इस दर्द के दौर में कौन है
जिसे  आह की  भाषा नहीं आती
पीड़ा  की  परिभाषा नहीं आती
उम्मीद गुजर जाने के बाद भी
फिर से उसे आने की आशा नहीं आती
विगत स्वप्न के आकर्षण की
कोई अभिलाषा नहीं आती
 संवेदित अधरों के कोनों पर
पुनः पुनः   प्रत्याशा नहीं आती ।
अनिल  कुमार शर्मा  12/09/2014








Thursday, 11 September 2014

कभी मेरे सीने में दिल हुआ करता था
और उछलता था बहुत तेज
प्यार के छींटे पर
फिसलता था बहुत  तेज
मैं तो फिसला
और प्यार भी फिसल गया
दिल को इतना मसल गया
अब तो बस धड़कने है शेष
कुछ प्यार के प्यारे अवशेष
कभी -कभी पुराने घाव की तरह
प्यार की पुरवाई में हरे होते है
इस उम्र के किसी कोने में
उस सुनहरे ख़्वाब में  खोते है
अनिल कुमार शर्मा
12/09/2014

Wednesday, 10 September 2014

SHE AND HE
Now I am She possessed by He
Who is She and who is He
Beyond the nature
Engulfed in the culture
She is His and He is Her
Where do they differ
For power and privilege
For Home and Village
The rough and the fair
Where do they share
Between freedom and bondage
For commitment and escape
Life is not  such a pure logic
Of measurement and precision
It is all the occasion and  the decision
Thrown in the all the unknown
 From where we come 
And where to go
What is the destiny of She
And what is the destiny of He
Between Love and Hate
Blasphemy and faith
Power and State
It is all Home and Out
Nothing but a wild shout
Breaking of all without
Anil Kumar Sharma
10/09/2014

 





Friday, 5 September 2014

Something puzzles me
Always in the discourse of life
And beyond the realm of death
 I come across many why and what
I am always zero at thought
What I accept and what I deny
This is something true and lie
But I want to fulfill  an unknown passion
Where I seek the value of all mortal life
My moral and ethics colored with
Necessary economics and politics
 Grazes my evergreen and salty soul
Something oozes out from hole of this whole
Thus I decay from all my empire of eternity
Only God knows my illusion and reality .
Anil Kumar Sharma 05/09/2014


 






Wednesday, 3 September 2014

कविता के गाँव में
कविता के गाँव में
कई तरह की कलम उगी  थी
कोई  फूली थी कोई पचकी थी
कोई स्याही में डूबी थी
कोई लिखकर टूटी थी
प्राचीन नदी के किनारे
एक प्राचीन कुटी थी
अबूझ भाषाओँ की चीख
समय के जंगल में गूंजी थी
सूने कान में आवाजों के डोरे
सूत्र बन जिह्वा पर बोले
ध्वनि के चित्र खोले
कविता विचित्र हो
संतप्त जीवन की
आह्लाद भरी मित्र हो
वाल्मीकि नहा रहे थे
दो परिंदे पेड़ पर हनीमून मना रहे थे
ब्याध ने बाण छोड़ दिया
कॉमेडी को ट्रेजेडी में मोड़ दिया  
कवि हृदय की आह छूट पड़ी
कविता वही से फूट पड़ी
यह सद्पीड़ा की अनुभूति है
चेष्टाओं की विभूति  है
कविता शिशु के मुँह में
माँ के चुचूकों की प्रथम धारोष्ण दुग्ध है
जो उसके  किलकारियों से अतिशय मुग्ध है
अनिल कुमार शर्मा  ०४/०९/२०१४/


Tuesday, 2 September 2014

My sun my dear sun
You rise in the east
And set in the west
As you rise like a red bud
Brooding in the lap of blue sky
And streams of milk of light
Come out of growing bosom
All feast of life and love
Germinate with full blossom
And you set blue turns to dark
All we tired with your fading gloom
Rest in dark for your next bloom
Anil kumar sharma 03/09/2014



Friday, 29 August 2014

At the beginning of the last time
I would like to be lost in the dim
As I came from the almost dark
Live long to seek the light
 The destiny of my last moment
Do not know whether light or dark
This is the reason of a hark
All my deeds directed in the flash
And resulted in a supper clash
As I sensed temporal light and dark
And pass through the mundane park
All sense sublimated in the fume
 At the juncture of light and dark
Like a blind dog to the delicate air
Do nothing but only bark and bark.
 Anil Kumar Sharma
30/08/2014



 

Thursday, 28 August 2014

उस भूख से चलकर
 अब  इस भूख तक आ गया हूँ
लगता  है समूचा दौर खा गया हूँ
 वही प्रश्न  बार  बार दुहराते हुए
इस कदर उकता  गया हूँ
कि कोई प्रश्न शेष नहीं है
उत्तर भी अवशेष नहीं है
आसमान की उम्मीद में
जमीन सरक गयी
अब तो खुशी के सब खिलौने
बिलकुल उदास पड़े है
उम्मीद की झोपड़ी में
सिर्फ खोखले विश्वास पड़े है
आँधियाँ चल  कर रुक गयी
तनी टहनी हिलकर  झुक गयी
पत्ते बहुत उदास है
फूल भी निःश्वास है
थोड़ी सी महक का भरोसाहै
बस इतनी सी उम्मीद को पोसा  है
अपनी जमीन में कोई दम है
 नहीं किसी का गम है ।
अनिल कुमार शर्मा
28/08/2014


 

  
 




  

Tuesday, 26 August 2014

भगवान ने कहा
भगवान को बताने वाले ने सुना
उसके कान में खोंट था
जीभ में लोच था
कितना सुना
और कितना कहा
प्रश्न यह है कि -----
केवल वह अपने लिए सुना
कि औरों के लिए भी  सुना
या वह  सबके लिए सुना
और अपने लिए ही  कहा
यही सनातन सत्य है
जो फिट है   वह फिट रहना चाहता है
जो फिट नहीं बैठता है
वह फिट को हिट करना चाहता है
परम्परा में सनातन सत्य
प्रभावी का पक्ष है
फायदा वाला रूढ़ है
घाटा  वाला प्रगतिशील है
विजेता और विजित
शोषित और शोषक
एक ही सिक्के के दो पहलू है
एक चित है
तो दूसरा पट है
यही संकट है
कि दोनों पहलू एक साथ नहीं होते
साथ साथ नहीं पाते
साथ साथ नहीं खोते
भीड़ के भुलावे में भीड़ परेशान है
अकेला तो और परेशान है
ज़माने का ज़माने पर एहसान है
नयी समझ और नया ज्ञान है
चिड़िया उड़ नहीं पाती
चींटी चल नहीं पाती
बन्दर गाँछ पर लटका है
यह अहसास अभी टटका है
भगवान  अभी भगवान  वाले में अटका है
 ईश्वर होने और न होने के मध्य
सवाल का दायरा इतना बड़ा
 जहाँ कि भूख का कोई हल नहीं
दर्शन दृष्टान्त तर्क -वितर्क
कुर्सी चाटते जीभ की ध्वनि
जो जमीं का खाती है
और आसमान बतियाती है
पुष्टिभोग के बाद स्वाद बदलता है
चिरंतन की जड़ता है
यही सच  है खुदा !
भगवान होने या न होने के बहाने
आदमी आदमी पर पड़ता है
अनिल कुमार शर्मा



Monday, 25 August 2014

किस घर से किस घर की बात करूँ
एक उजड़ा है एक बना बनाया है
एक जन्म लिया तबसे भूखा है
एक पेट से ज्यादा खाया है
एक ब्रह्म है दूजा माया है
 जीवन क्या तू एक छाया है?
परितोष किसे कब क्यों है
दुःख कातर मन भी क्यों है
दिन है और रजनी है
साजन है और सजनी है
मन भटका है अवरोधों में
 ज्ञान दृष्टि और शोधों में
अब तो आकुल अंतर है
 जीवन जल प्रांतर है
 मन बिचलित तन बोझिल है
किस पर कितना विश्वास करूँ
किस घर से किस घर की बात करूँ ।
अनिल कुमार शर्मा  २५ /०८/२०१४/


Friday, 22 August 2014

She told me something untold
With her speaking eyes and smiling lips
Tongue never moved and utter a voice
I felt an unheard rejoice
Flunked by sense of capture
Dismantled with awe of prate
Snooze in the air so fair
Meet in bosom a gold nugget
Shivering hands and shrinking lips
I felt petals of rosy cheeks
Smell of breathe and tune of heart
We come within defying the firth
Thus we feel and talk nothing
Is this to love something?
Anil Kumar Sharma 23/08/2014

Wednesday, 20 August 2014

It is cold summer
So cold with sweat
Choking breathe
And surfing heat
I feel a lot of nothingness
Where I born
And where I will be dead
Eating life long bread
My life is sown in my soil
Thus I bloom and bear fruits
May it happen likely
That I never sprout
Nothing will be come out
I shall remain with all without .
Anil Kumar Sharma 21/08/2014










Sunday, 17 August 2014

दीवारें  भी कुछ सुनती है
हवाएँ भी कुछ गुनती है
रोज -रोज मधुबन में
कुसुम कौन सी चुनती है
कितने दीपक झंझावातों में
बुझ विलीन हो जाते है
मधु मोहित स्मित कपोल
सुख कर मुरझाते है
यह यातनाएं जीवन की
बद्ध कम्पित मोह पाश में
क्षण भंगुर काया के
विलास आरूढ़ संत्रास में
कुछ मधु पराग जीवन के
संभावित सुख चुनने को
आये है दिनकर के द्वारे
रश्मि प्रभात बुनने को
मेरे सविता प्रकाशपुंज
मुझको आलोकित कर दो
मेरे मन के गहन कोष में
हटा अंध प्रकाशित कर दो |
अनिल कुमार शर्मा
18/08/2014

Thursday, 14 August 2014

मेरे स्वप्नों में पले जय हिन्द
 यथार्थ की पीठिका पर
कितने भिन्न हो ?
आदर्श गर्भ सिंचित
अब विद्रूप विकार में लय हो
मैं  ढूढ़ता   हूँ   इतिहास संचित
बलिदानों का वह राष्ट्रीय चरित्र
जो नेतृत्व के विकार में बह गया
सिर्फ बंजर  प्रतिकार में रह गया 
क्या जय हिन्द  तुम्हारी आत्मा
सिर्फ   विदेशी विनिवेश में सिमटी है
  सरकार किसी अदृश्य के हाथ में
चलती हुई चिमटी है
जनता सहमी है सिमटी है
भूख के दायरे भी  कितने कीमती है
सिकुड़े हुए पेट पर बाजार हावी है
यही बात बड़ी  प्रभावी है
जिसे जो बुरी लगती  थी
उसे बुरा कह कर उससे भी बुरा हो गया
अब वह अच्छा दिन कहाँ खो गया
मेरे जय हिन्द ये बता
अब तुझे क्या हो गया ?
अनिल कुमार शर्मा  14/08/2014

 

Monday, 4 August 2014

मैं समय के साथ चल रहा हूँ
अपना खाली  हाथ मल रहा हूँ
जिसे मूल्य समझकर सहेजता रहा
वह कौड़ी का तीन हो गया
एक तो करैला दूसरे चढ़े नीम हो गया
जिसे सोचकर लाज लगती थी
अब सरेआम हो रहा है
लगता है इस दौर में
 बहुत कुछ खो रहा है
खोद कर गढ़े गए इतिहास में
क्यों भविष्य रो रहा है
अब तो बस यही है
जो कह सको कहते रहो
बच बचाकर रहते रहो
एक अदद ज़िन्दगी में गुजरते रहो
ख्वाब को हक़ीक़त से कुतरते रहो
जिंदगी की आश में घुटते रहो
मौत के सिकंजे में टूटते रहो
जो है उसे स्वीकारने में
नमक की हाड़ी की तरह गल रहा हूँ
मैं  समय के साथ चल रहा हूँ
अपना खाली हाथ मल रहा हूँ
अनिल कुमार शर्मा
०४/०८/२०१४

Sunday, 3 August 2014

वह मन्त्र मुग्ध सा दिन जीवन का
मित्र जब तुम मिले मुझसे पहली बार
मुझे  लगा पा  गया  विस्तार
अपने स्वत्व के प्रांगण में  
आत्मा में अतिक्रमित कर गया
गोपनीयता के खोल में बंद
संवेदना के   गुह्य  रत्न
खोल दिया विश्वास के  कोषागार में
एक  सुखद संतोष के  आगार में
मित्र वह तुम थे जहाँ मैं विस्तृत हो गया
तुम्हारे अस्तित्व में खो गया
अब तो एक प्राण दो देह है
मेरे और तुम्हारे बीच
नहीं कोई संदेह है
अनिल कुमार शर्मा
03/08/2014






Friday, 1 August 2014

पांडेपुर के चौराहे वाले प्रेमचंद
क्या लमही छोड़ दिये ?
गबन और गोदान के बीच में
मंगलसूत्र टूट गया
वह कौन है ?
जो धनिया और होरी को लूट गया
गोबर तो मॉल में सड़ रहा है
मातादीन आज भी वही पोथी पढ़ रहा है
सिलिया के चक्कर में पड़ रहा है
मेहता और मालती सरेआम घूम रहे है
चौराहे पर एक दूसरे को चूम रहे हैं
 ओंकारनाथ तुम्हारी बिजली
गरीबो को करेंट मारती  है
अमीरों के आगे दाँत चियारती है
हलकू फांसी के फंदे में झूल रहा है
सोहना  बहुराष्ट्रीय में  फूल रहा है
 पंच में से परमेश्वर गायब है
न्याय में सही गलत सब जायज है
 ईदगाह में चिमटा है
 अब कर्मभूमि में काले खां 
सहमा है सिमटा है
झूरी  के पास न हीरा है न मोती है
इज़्ज़त पर एक फटी धोती है
 नमक का दरोगा
अलोपदीन के पानी में घुल रहा है
सारा वसूल भूल रहा है धनिया और झुनिया रोती है
बूढी काकी भूखे पेट सोती है
भगत की मन्त्र सूखी  घास है
सियासत की रंगभूमि में टूटता
आज भी बेचारा सूरदास है
प्रेमचंद आज भी  वही फ़न है
मरते समाज में   कफ़न है
जान से कीमती आलू है
आज भी वही दास्तान चालू  है
 तुम्हारे   ज़माने के सब सपने
उदारवाद में सड़कर फूल गए
पांडेपुर के चौराहे वाले प्रेमचंद
क्या लमही भूल गए ?
अनिल कुमार शर्मा
31/07/2014

Monday, 21 July 2014

मेरी जिह्वा की प्रत्यञ्चा से
उद्बुद्ध शब्द-बाण
मुझे ही बेधते  है
अब मैं पराजित स्वप्न का
एक खोखला भविष्य हूँ
तुम्हारे में और मेरे में
 दृष्टमान  निषिद्ध हूँ
प्रवाहमान प्रकाश में सनिद्ध हूँ
किन्तु क्यों पाषाण में भी
संवेदना उकेरते हुए मैं
प्रतिमा के भाव से मूर्तिबद्ध हूँ
कठोर तत्व के सद्धभावदर्श
कर सकोगे अवगाहित
मेरे कोमल स्पंदन के भाव
मेरे अस्तित्व पर उठे
मेरे ही शब्दवाण से
कर सकोगे मेरा परित्राण ?
अनिल कुमार शर्मा 22 /07 /2014


Saturday, 19 July 2014

लोगों को मैंने हँसते देखा रोते देखा
पैर पसारे सोते देखा
अपने -अपने में खोते देखा
इस दुनिया के कोने कोने में 
रोज चीर -हरण होते देखा
गिरे हुए इंसानो के
कुकर्मों को होते देखा
दानवता को जीते देखा
मानवता को मरते देखा
हम किस खेत के मूली है
हम किस व्यवस्था के कुली है
जिसको ढोते रहते है
हम तो रोते रहते है
अनिल कुमार शर्मा १९/०७/२०१४


Tuesday, 15 July 2014

शून्यांक- त्रुटि
पोशाक अलग -अलग है
सिर्फ एक ही खूँटी है
सरकारी यन्त्र में भ्रस्टाचार
एक शून्यांक त्रुटि है
जो इसके हर पुर्जे में व्याप्त है
मानक के सापेक्ष सदा अपर्याप्त है
इस यंत्र में हम सभी यंत्रवत है
इतने संघर्षों के बाद भी
घर्षणविहीन जड़वत है
जो जिधर चल दिया चलता रहा
दोस्त तू जड़त्व में हाथ मलता रहा
इस विकासवाद की गर्मी से
मेरे सपनों का हिमालय पिघलता रहा
अब जर्जर दीवारों पर रंगीन पुट्टी है
लक्ष्य  और प्राप्ति के बीच
सिर्फ शून्यांक त्रुटि है
अनिल कुमार शर्मा 16/07/2014
 


Saturday, 12 July 2014

अच्छे दिन !
 आप की नज़र किधर है
मोदी की सरकार इधर है
हम तो कल भीड़ थे
 आज भी भीड़ हैं
 एक  अजीब सी चिढ़ है
सत्ता के भीतर
और  सत्ता के  बाहर
अलग -अलग नीड़ है
नादान पक्षी
तुम्हारी  यही तक़दीर है
दाने  के ऊपर जाल है
दोस्त क्या  हाल चाल है
हम तो पिचक गए
उसका फूला गाल है
अच्छे दिन !
क्यों इतना बुरा हाल है
अनिल कुमार शर्मा


 

 
 


 

Friday, 11 July 2014

Beyond Language

All languages are human
If you say humane
I understand that
Language does not matter to me
I see your lips and eyes
Feel the beat of heart
And observe the rhythm of breathe
I understand you such and so
That no word or language can translate it
I express you half and feel full
Thus differs my tone to known
Merge in better unknown
Where I know all but express nothing
I feel my language lacks something
All I grasp and part I express
What I want never manage
I want to say beyond language
Anil Kumar Sharma
11/07/2014









Wednesday, 9 July 2014

सुनो कॉमरेडों
क्रांति के मतभेदों
तुम्हारे लाल झंडे के
कई टुकड़े हुए
हम रह गए
मात्र डंडे पकड़े हुए
अब क्रांति तुम्हे गरियाती है
भूख हाथी पर बैठ कर जाती है
कभी साइकिल चलाती है
लालटेन जलाती है
तीर धनुष चलाती है
कमल सूंघती और सुंघाती है
जनता से सरकार
और सरकार से जनता में
पकाती है खाती है
फूटपाथ पर
चक्कर लगाती है
अनिल कुमार शर्मा 10/07/2014

Monday, 7 July 2014

 झोपड़ी वालों
तुझे महलों से प्यार करने का हक़ नहीं है
व्यवस्था ऐसी है कि नफ़रत भी नहीं कर सकते हो
सिर्फ महलों की ऊंचाई के लिए मर सकते हो
अनिल कुमार शर्मा

Thursday, 3 July 2014

आप कह कर चुप हो गए
मैं सुनकर चुप हो गया
चुप होने के अलावा कोई चारा नहीं था
कुछ देखने लायक नज़ारा नहीं था
पेट और जेब के अनुपात में
सरकारी बटुआ खाली है
सपने दिखाने के दांव -पेंच में
बनायीं गयी हवा अब जाली है
कहर कहने से कम नहीं होता
हक़ीक़त जानने वाले के ज़ेहन में
हक़ीक़त में कोई गम नहीं होता
सूखाग्रस्त सूखे खेतों के परे
साहबों के गमलों में खिले गुलाबी आँकड़े
ज़मीन से हट कर कुछ और बोलते है
विकासशील देश में विकास खोलते है
पूंजी निवेश के जुगाड़ में
पाला बदल कर बोलते है
दुकान और देश के बीच जनता सवाल हो
आलू ,प्याज ,तेल में बेहाल हो
उसे फायदे के हिसाब से बेचने का हक़ है
मुझमें खरीदने की कूबत नहीं रही
अब सारी योजनाये बाज़ार में बही
उसे तो बस दिखाने के लिए दुःख है
मेरे भूख के खाते में भूख ही भूख है
पकवानों के इश्तेहार से छला गया
अब मैं लार टपका रहा हूँ
कुछ कहने में ज्यादा सकपका रहा हूँ
अनिल कुमार शर्मा (04/07/2014)

Wednesday, 2 July 2014

थोड़ी भूख बाकी रहने दो
पूरा पेट मत भरो
कुछ दिमाग खाली रहने दो
जहाँ नए विचार प्रवेश पा सके
नए स्वाद को इत्मीनान से खा सके
अब दुनिया ऊबी -ऊबी सी है
गहराई में गहरी डूबी -डूबी सी है
ढाक के तीन पात जैसी
मुरझाकर झुकी -झुकी सी है
ये किस प्रगति का गीत गा रहे है
अपने नस्ल का क्यों बीज खा रहे है
हरे -भरे खेत में मुरझाया खेतिहर खड़ा है
उसके उम्मीद से क़र्ज़ का ब्याज बड़ा है
फसल को पानी देने में उसका पानी मर गया
गमछा फट गया कुर्ता भी सड़ गया
क्यों नंगा सीना ताने खड़ा है
बिना बेंट का फावड़ा है
बीमार बीबी खेत में खिलाती है
कुँवारी बेटी खेत में रुलाती है
महँगाई यमदूत की तरह बुलाती है
बाजार उसकी आँखे खुजलाती है
समस्याएं टाँग हिलाती है
एक खुराक जिंदगी मौत को पिलाती है
यह मामला भी खूब है
लुभाती हुई ऊब है
राजनीति जनेऊ पहनकर
उससे व्रत करा रही है
अच्छे दिन दिखाकर
वोट का दान पा रही है
पूरे खेत समेत उसको खा रही है
अनिल कुमार शर्मा  02/07/2014

Tuesday, 24 June 2014

भगवान ने कहा
भगवान को बताने वाले ने सुना
उसके कान में खोंट था
जीभ में लोच था
कितना सुना
और कितना कहा
प्रश्न यह है कि -----
केवल वह अपने लिए सुना
कि औरों के लिए भी  सुना
या वह  सबके लिए सुना
और अपने लिए ही  कहा
यही सनातन सत्य है
जो फिट है   वह फिट रहना चाहता है
जो फिट नहीं बैठता है
वह फिट को हिट करना चाहता है
परम्परा में सनातन सत्य
प्रभावी का पक्ष है
फायदा वाला रूढ़ है
घाटा  वाला प्रगतिशील है
विजेता और विजित
शोषित और शोषक
एक ही सिक्के के दो पहलू है
एक चित है
तो दूसरा पट है
यही संकट है
कि दोनों पहलू एक साथ नहीं होते
साथ साथ नहीं पाते
साथ साथ नहीं खोते
भीड़ के भुलावे में भीड़ परेशान है
अकेला तो और परेशान है
ज़माने का ज़माने पर एहसान है
नयी समझ और नया ज्ञान है
चिड़िया उड़ नहीं पाती
चींटी चल नहीं पाती
बन्दर गाँछ पर लटका है
यह अहसास अभी टटका है
भगवान  अभी भगवान  वाले में अटका है
 ईश्वर होने और न होने के मध्य
सवाल का दायरा इतना बड़ा
 जहाँ कि भूख का कोई हल नहीं
दर्शन दृष्टान्त तर्क -वितर्क
कुर्सी चाटते जीभ की ध्वनि
जो जमीं का खाती है
और आसमान बतियाती है
पुष्टिभोग के बाद स्वाद बदलता है
चिरंतन की जड़ता है
यही सच  है खुदा !
भगवान होने या न होने के बहाने
आदमी आदमी पर पड़ता है
अनिल कुमार शर्मा



Monday, 23 June 2014

एक महंगा आदमी है
और एक सस्ता है
एक और आदमी है
जो न तो महंगा है न ही सस्ता है
सिर्फ उसकी हालत खस्ता है
आँखे गीली है
जेब ढीली है
जिंदगी नीली -पीली है
सपने बुनता है
कुछ राहें चुनता है
समस्याओं की बरसात में
नमक के ढेले की तरह
रह रह कर घुलता है
किस्मत को कोसता है
बहुत दूर तक सोचता है
जिंदगी में जिंदगी को नोचता है
उसके कलेजे में कुछ कोंचता है
खुद रोते  हुए दूसरों का आंसू पोछता है
उसकी जिन्दगी अजीब है
उसे इस अँधेरे में भी उम्मीद है
अनिल कुमार शर्मा   24/06/2014

Sunday, 22 June 2014

यह दौर
और यह सवाल
 दोनों कितने खतरनाक है
सब कुछ सही लगते हुए
आखिर कहाँ इतना गलत हो जाता है
यह देखकर दिमाग चकराता है
सही गलत और गलत सही हो जाता है
कही का सियार कही का बाघ हो जाता है
फटी किताबो में घुन खाए अक्षरों की तरह
कुछ भकड़े हुए ईमानदार लोग
बेईमानी की चिकनी सतहों पर फिसल जाते है
बेईमान ईमानदार कहलाते है
ईमानदार बेईमान हो जाते है
सियासत के रासायनिक परिवर्तन का प्रभाव है
इस दौर का यही गुण -धर्म -स्वभाव है
और तुम सवाल पूछते हो ऐसा क्यों है ?
यह सही है सवाल मुखर है
जबाब मौन है
सवाल यह है कि
इस सवाल के घेरे में कौन है
मैं भी कतराता हूँ
तुम भी कतराते हो
और वह तो और कतराता है
अब इस सवाल का सामना
कोई भी नहीं कर पाता है
समय के कटघरे में
अब ऐसा क्यों है ?
यह सवाल पूछने में डर लगता है
मेरे दोस्त अब ये बता
तुझे यह दौर किस कदर लगता है ?
अनिल कुमार शर्मा


Saturday, 21 June 2014

When I came to my name
Bound with a lust of fame
I know such and so
In field with harrow and hoe
 Unearth the earth
Delve in the sky
Now I am so hi-fi
I am surrounded by toxins
Clouds with acid rain
Less pleasure much pain
With such big ozone hole
Melting both the pole
Damaging whole in whole
Alas! we have to progress
Now either play the digress
Come in nature with sharp razor
Pulled the stem and cut the root
This is our real science
And lament back in time
We are in search and research
Making our earth a desert
Anil Kumar Sharma
21/06/2014






Sunday, 15 June 2014

यह शहर है चोरों का
 घूसखोरों का लतखोरों का
जहाँ गंगा में गन्दी नाली बहती है
मंदिर के पीछे वेश्याएँ रहती है
जहाँ लड़की में मादा है
लड़को में नर आमादा है
यह देश काल का वादा है
नव युग का दादा है
पुलिस जहाँ की डरती है
गुंडे की ताकत बढ़ती है
नेता वैभव कीना है
अफसर बड़ा कमीना है
फिर भी जनता को जीना है
इसी जहर को पीना है
सड़को में खाई है
चेहरों पर झांई है
गाड़ी शीशे वाली है
गलियों में नाली है
हवेली खड़ी चमकती है
बदबू चहु ओर महकती है
कुछ कुत्ते है कुछ सूवर है
कुछ घूरे है कुछ घर है
कचरा और कबाड़ी है
कुछ गड्ढे है  कुछ झाड़ी है
जगह जगह सड़ता पानी है
ये शहर बड़ा खानदानी है
बिजली के खम्भे टूटे है
पेड़ जहाँ पर ठूँठे है
नक़्शे में हरियाली है
उकठे पेड़ों की डाली है
संस्कार जहाँ का खाली है
यह नगरी बड़ी निराली है
अनिल कुमार शर्मा
१६/०६/२०१४

Saturday, 7 June 2014

तुम कौन हो ?
मैं कौन हूँ ?
 तुम मोहब्बत के चादर से ढक देती हो
मैं नफ़रत के पंजे से फाड़ देता हूँ
तुम कौन हो ?
मैं कौन हूँ ?
सलीके से खोलती हो दरवाजे को तुम
मैं धड़ाक से कुण्डी मार देता हूँ
तुम कौन हो ?
मैं कौन हूँ ?
आँचल से ढक के लौ को जलाती हो तुम
पछुआ हवा मैं झोक देता हूँ
पुरवाई की स्वागत में तुम लीपती हो आँगन
चौखट पर खड़ा होकर मैं रोक देता हूँ
तुम कौन हो ?
मैं कौन हूँ ?
आँगन में तुलसी को सींचती हो तुम
गमले में कैक्टस मैं रोप देता हूँ
आस्था की सफेदी लगाती हो तुम
बुद्धि की कालिख मैं पोत देता हूँ
तुम कौन हो ?
मैं कौन हूँ ?
अनिल कुमार शर्मा  ०८/०६/२०१४/
उत्तरआधुनिकता का समर्थक हूँ


मैं भाषा को तोड़ता हूँ
स्वर व्यञ्जन  मोड़ता हूँ
शब्दों में सार्थक कम, ज्यादा निरर्थक हूँ
उत्तर -आधुनिकता का समर्थक हूँ
अंको में बोलता हूँ , शब्दों में तोलता हूँ
संकेतों में इधर -उधर डोलता हूँ
खोखले प्रतीकों पर भुरभुराता बिंब हूँ
पानी के हलचल में हिलता प्रतिबिंब हूँ
साहित्य के कटोरे में , विभ्रम में तराशे हुए
चाँदी के शब्द सोने के भाव भरता हूँ
हक़ीक़त में जस्ते के टूटे बर्तनों में
जिंदगी के घुटते सांसों का हिसाब करता हूँ 
ज़मीं पर होते हुए ज़मीन पर होने में डर लगता है
बहुत दूर का आसमान अपना घर लगता है
पांव कीचड़ में सने है नज़र सितारों की सैर करती  है
अपनी गढ़ी हुई दुनिया इस दुनिया से वैर करती है
अपनी सिमटती जिंदगी अपनों से गैर करती है
भाषा और विभाषा का तर्क मिलाता हूँ
शब्दों को नया अर्थ पिलाता हूँ
पाले गए व्याकरण में विचित्र वाक्य बनाता हूँ
टूटते समाज के शब्दों को जोड़कर
नया सिंटेक्स बनाता हूँ
यह बात कितनी विचित्र लगती है
व्याकरण की भाषा कविता को ठगती है
ठगी हुई कविता आँसू बहा कर फिर से मुस्कुरा रही है
शब्दों के जाल से छनकर भावना बहा रही है
ठोस बर्फ छूने पर पिघल रहा है
कवि का हृदय उबलता वायु निगल रहा है
पिघलते पिघलते बिल्कुल अमूर्त हूँ
अपनी भाषा में स्वतः स्फूर्त हूँ
आदमी के टूटन का घुटन का प्रतिमूर्त हूँ
बाजार के चौराहे पर बैठी कविता
दीदा फाड़कर रो रही है
थकी हुई कलम गहरी नींद में सो रही है
आलोचना थ्योरी में खो रही है
नयी तरह की गोलबंदी हो रही है
कुछ कलम घसीटू रेवड़ी लिख रहे है
चिन्तनशील होने की चिंता में दिख रहे है
प्राचीनता को तोड़ता आधुनिकता
अब उत्तरआधुनिकता में बिखर रहा है
आदमी का नंगापन अब बेहतर निखर रहा है
महसूस होने तक महसूस में सिहर रहा है
सड़े साम्राज्य की कथा में बिहर रहा है
पहचान खो कर पहचान बनाने में परेशान है
"भड़ैती "का सिद्धान्त ढूँढता विद्वान है
टूट कर बिखरा हुआ ,ज़मीन छोड़कर निखरा हुआ
धुंध में ढका हुआ साफ सुथरा आसमान है
उत्तरआधुनिकता की रंगीन गड़ही में नहाकर
तरह तरह का पोशाक पहनता हुआ
कटी जुबान में बिना सिर पैर का इंसान है
महज़ वर्तमान में फिट होने की जिद है
अतीत से भागा हुआ अधर में लटका भविष्य है
चाक पर घूमता है एब्सर्डिटी में झूमता है
फटे होठ का खून चूमता है
हँसने के भ्रम में ज्यादा रो रहा है
लगता है घोड़ा बेचकर सो रहा है
अपनी छोटी पहचान को बड़ी पहचान से धो रहा है
आम उखाड़ कर बबूल बो रहा है
आदमी की समस्या रोबोट के आगे रो रहा है
अब तो आदमी की आदमियत फीकी है
यह तकनीकि सचमुच में तीखी है
अनिल कुमार शर्मा    26/12/2014



Wednesday, 4 June 2014

मेरे जहरीले शहर !
पूछते हो क्या हुआ है
जहाँ सुबह भी धुवां है
शाम भी धुवां है
जमीं पर जिनके पैर नहीं है
उनके गाड़ी के पीछे धुवां है
अब तो एक घर के जगह पर तीस घर  है
फिर भी आदमी बेघर है
गलियों में तमाम ब्रांडों के पॉलीथीन पटे है
संकरी जगह में घरों से घर सटे है
किन्तु आदमी आदमी से  कटे है
हम आधुनिक लोग तो
अपने कद से कुछ ज्यादा घटे है
चमकते जूतों के तलवे फटे है
क्यों हम अपनी जमीन से इतने कटे है
चहारदीवारी के बहार अविश्वास खड़ा है
गलियों में एक अजीब खौफ पड़ा है
हर जगह लगता है कुछ सड़ा है
साज़िशों की बदबू से दिमाग भरा है
क्यों इतना गुनाह हर जगह है
इसका गुनहगार कौन है
इस सवाल पर मेरे शहर !
क्यों इतना तू मौन है ?
अनिल कुमार शर्मा  ०४ /०६/२०१४

Monday, 2 June 2014

जबसे दूनो अंखिया क बउल भइल फ्यूज
रास्ता जपत चलेली प्लीज प्लीज एक्सक्यूज़
प्लीज प्लीज एक्सक्यूज़ जपत बस पर चढ़ली अकुता के
तौले ईगो बिटिया आइल हमरा के धकिया के
चिक्कन चिक्कन गाल लाल छींट क पहिनवा
बड़ी जोर से धकियावे एक त चले न तनिको हवा
हम कहली बाची होने जा खाली  बा सीट जनाना
एधिर कहाँ अइलू कुल्ह बाड़न मरदाना
आँख तरेरलस अगवा जाके भुसुराइल
अपनी जाने गरजलस बाकी बकरी अस मेमियाइल
बूढ़ा क्यों बक बक करता है ऑफ हुआ माइंड है
लइका को लइकी बुझता है पूरा पूरा ब्लाइंड है
ई कुञ्ज बिहारी क लाइन ह

Sunday, 1 June 2014

सुनो किसानों
सुनो किसानों ! कृषि प्रधान देश के कर्णधारों !
तुम्हारे खेत को कबूतर चुग गया
नयी रोशनी का सूरज उग गया
सड़ी रोशनियों वाली खिड़कियाँ बंद करो
और अँधेरा हो जाने दो
पुरानी रोशनी को एकदम खो जाने दो
नयी रस्सियों में अपने हाथ -पाँव  बाँधकर
उसका छोर मुझे दे दो
जिसमे गाँठ लगा सँकू
और उसे पेटेंट करा सँकू
गाँठ लगाने की तकनीक मेरी है
जिसमे कि तुम बँधे हो
तुम्हारे खेतों में उगे अनाज
मेरी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी है
तुम्हारे पास सिर्फ तुम्हारी मेहनत
और तुम्हारे खेत की ऊसर मिट्टी है
नियम यह है कि बादल मैं बनाऊंगा
बरसात से तुझे बरकना होगा
तुम्हारे खेत में मेरे ही ट्रैक्टर चलेंगे
मेरा ही बीज और खाद छिड़कना होगा
तुझे फसल चरते भैंसे को रोकना होगा
मेढ़ को हर तरफ से तोपना होगा
तुम अपने ही खेत में बिजूके हो
पेट के सवाल पर क़र्ज़ के ब्याज में डूबे हो
चिथड़ों की गर्दिशे तुम्हे लुभाती है
पैदवार के नाम पर ----
सटे खेत का मेढ़ खुदवाती है
तुम्हारे खेत में खुले सांड़ है
घरों में पंचायत है
विकास होते हवा की यही इनायत है
बगल में ताड़ी खाना है
उससे सटा थाना है
तहसील है कचहरी है
पसीने से भींगते तन की आग हरी है
सड़ी जुबान में खोटी है खरी है
बस बात इतनी है कि
खेत में घुस गयी कोई बकरी है
तुम्ही गवाह और साबुत हो
निहायत गफलत इतनी ही
कि तुम मजदूर और किसान हो
 किसी जातिगत   ढांचे के बिधान हो
मेढ़ खोदकर मेढ़ बनाने में परेशान हो
जय मजदूर ! जय किसान हो!
अनिल कुमार शर्मा   ०१ /०६ /२०१४
( कंगाल होता जनतंत्र से पेज -105 )

Thursday, 29 May 2014

शून्यवाद
मैं अपने निहायत शून्य से परेशान हूँ
तुम एक के बाद नित्य प्रतिनित्य
एक दो शून्य रखते जा रहे हो
मैं सदा शून्यपति हूँ
तुम आज हजारपति हो
कल लखपति हो
परसों करोड़पति  हो
आगे अरबपति हो खरबपति हो
मैं शून्य में शून्य जोड़ता हूँ
शून्य में शून्य का गुड़ा भाग करता हूँ
शून्य से शून्य घटाता हूँ
बस सिर्फ शून्य और शून्य पाता हूँ
शून्य खाता हूँ शून्य पीता हूँ
शून्य जीता हूँ
तुम किसी संख्या के बाद
शून्य पर शून्य रखते जाते हो
मेरा शून्य झोपड़ी से हवा हो जाता है
तुम्हारा शून्य महल बनकर इतराता है
मै कहता हूँ ईश्वर शून्य है
तुम कहते हो ईश्वर किसी संख्या के बाद
अनन्त शून्यों की कतार है
सत्य यह है कि ----
मेरा भी शून्य झूठ है
तेरा भी शून्य झूठ है
किन्तु मेरे शून्य में विपन्नता है
तुम्हारे शून्य में सम्पन्नता है
तुम्हारा अनंत होता शून्यवाद
ब्रह्मवाद ,मायावाद ,बाज़ारवाद का उदारवाद
संख्याओ के मिश्रण से बड़ा प्रभावकारी है
मेरा विशुद्ध शून्यवाद शून्य होते हुए
एकदम शून्यकारी है
अनिल कुमार शर्मा  
३० /०५/२०१४/ ( कंगाल होता जनतंत्र से )

Tuesday, 27 May 2014

Morning sun and evening sun
My day starts and so done
Thus I live a day, an hour and a moment
On surf of time I surge  different
O my night throw some light
I am being deceived day by day
Let me console my torn heart
Lo I live a pleasing dearth
Anil Kumar Sharma   28/05/2014




गली के मोड़ पर दो कुत्ते भौक रहे थे
एक घूरे पर से आया था
दूसरा मंदिर के नाबदान से आया था
पहला मुर्गे की टाँग मुँह में दबाया था
दूसरा शिवाले का बहा दूध पी कर आया था
पहला खुद को सेक्युलर बताते हुए
दूसरे पर कम्युनल का आरोप लगाया था
दोनों आपस  में खूब भौंक रहे थे
शेष कुत्ते चौंक रहे थे
एक गधे के समझ में कुछ नहीं आया
वह बस रेंकने लगा
कुत्ता भौंकना  छोड़कर उसे देखने लगा
शेष कुत्ते समझ गए
गधा समझदार है
इसकी बातें वजनदार है
लगता है अभी यह सच्चा है
इन दोनों भौकने वालों से अच्छा है
शेष घबराये कुत्ते गधे पर चढ़ गए
गधे के साथ कुछ दूर तक बढ़ गए
यह देखकर और जानवर साथ आ गए
पूरे जंगल में छा गए
दोनों कुत्तो का विश्वास खा गए
गधा शिवाले की घास चर रहा है
अब समय गुजर रहा है

Sunday, 25 May 2014

अब अच्छे दिन आने वाले है
कौवे मोती खाने वाले है
एक जमूरा चला गया
नया मदारी आया है
कुछ सपने नया दिखाया है
शंकर जी के नगरी में
डुग -डुग डमरू बजाया है
काशी को आज सजाया है
देखो कौन लोग कुछ पाने वाले है
किसके अच्छे दिन आने वाले है
कौवे मोती खाने वाले है

Saturday, 24 May 2014

I read good morning and good night every day
But rarely happens such and occasionally nay
But friends I accede your auspicious tone
What could we do except expecting good
Love is better than we hate
Our endeavor  is better than our fate
This world is our to the extent we know
Otherwise this is a  mystery and foe
We know best in our  like and love
Paradoxes are beneath and above
We are swimming across limitless sea
Our life is limited desires are high
What we do , do and die.
Anil kumar Sharma 25/05/2014








Friday, 23 May 2014

बाहुबली

एक बाहुबली है
सुबह  मंदिर में घंटा बजाता है
देर शाम चकले में जाता है
दिन में पवित्र प्रसाद से लेकर
मदमदाते शराब में मस्त रहता है
भीरु जनता में ब्यस्त रहता है
माथे पर चन्दन टीका रोली है
जनेऊ में पिस्तौल और गोली है
उसके आलीशान महल में
शिव के  त्रिशूल  और गणेश के सूंड में
कारबाईन और राइफल टँगी है
तिजोरी के ऊपर राधाऔर त्रिभंगी  है
रामायण के ऊपर छूरा रखा है
हिंसा ने अहिंसा को चखा है
गाँधी की तस्वीर आईने में रखा है
बनियों से रंगदारी टैक्स लेता है
ठेकेदारों से जजिया और चौथ लेता है
सांसद और बिधायक को धौंस देता है
अफसरों को रौंद देता है
यही उसकी करतूत है
जनता अभिभूत है
उसके पास बुलेट प्रूफ गाड़ी है
कुर्ता , पायजामा ,सलवार और साड़ी है
टोपी और खड़ाऊ है
 बेलबूटा और जड़ाऊ है
चैरिटेबल ट्रस्ट और स्कूल है
एन जी ओ ,जिम ,स्वीमिंगपूल है
मंदिर ,मस्जिद ,गिरजे का आना -जाना है
उसके पास बड़ा कसाई खाना है
हर जगह से नोट बरसते है
उसकी कृपा कटाक्ष को सभी तरसते है
कानून व्यवस्था सब कुछ वही है
सबसे बली बाहुबली है
अनिल कुमार शर्मा         २३ /०५ /२०१४







Thursday, 22 May 2014

Live Foul and fair

My life and death
My love and hate
My blood and bone
My words and tone
I am composed of  these all
These are my rise and fall
I emerge different of all
Where I differ to me
All that I see
I am enemy of me
This is my defense
A serious offense
I am committed to life
But life is not committed to me
I breathe the air
Live foul and fair.
Anil kumar Sharma

Wednesday, 21 May 2014

कुछ सवाल खुश्नुमे थे
अब कुछ जबाब खुश्नुमे  है
जो फूल टहनी पर लगे थे
उनके हार भी खुश्नुमे है
फूल तो खिल गया
कली मुरझा गयी
उम्मीद में उम्मीद खा गयी
रोशनी इतनी तेज है
जहाँ कुछ दिखाई नहीं देता
आशीर्वाद के दौर में
दुखड़ा सुनाई नहीं देता
पानी में पानी मिलाते हुए
पानी का रंग दिखाई नहीं देता
हमें उनकी फ़िक्र ज्यादा है
जिन्हें फ़िक्र करने आता ही नहीं
समझ के दायरे में इसे 
कोई  समझ पता ही नहीं
जंगल वही है बस शेर दूसरा है
अब देखना है
कितना खोटा है
कितना खरा है
अब इस दौर में
कितना सूखा है कितना हरा है
अनिल कुमार शर्मा 22 /05 /2014

Thursday, 8 May 2014

जिसने लोकतंत्र कमा लिया   
अब तो सवाल यहाँ खड़ा है
जन प्रतिनिधि का भ्रस्ट होना
और जनता का वोट देना
दोनों बराबर है
किन्तु यहाँ एक के सिर पर दोष है
बाकी निर्दोष हैं
सत्ता के सवाल पर
जनता और नेता चुप हैं
स्वरुप विद्रूप है
वोट देने और लेने का लोकतंत्र है
नयी सोच का यही नया मन्त्र है
अब तो पार्टी का वोट बैंक होता है
और नेता का स्विस बैंक होता है
विकास के बजट मे घोटाले है
जिन्हे बड़ी ईमानदारी से हम वोट डाले है
सरकार निजी निगम के दबाव मे है
जनता अपने जातिगत स्वभाव मे है
यह मूल्य -हीन अर्थव्यवस्था
डिब्बे बन्द पूंजी तलाश रही है
उदारीकरण की वातानुकूलित हवा मे खाँस रही है
मीडिया उससे टपकते मधु को चाट रही है
बिककर खबर पाट रही है
अब तो एक छोटे से कमर्शियल ब्रेक के बाद
एक बहुत बड़ा बलात्कार होता है
मीडिया में इसी तरह का चमत्कार होता है
यह लोकतंत्र एक खिलौने की दुकान है
जहाँ बाघ के पीठ पर बकरी रख दी जाती है
बाघ गुर्राता है बकरी मिमियाती है
वाणी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पाती है
एक सीना फाड़कर खून पीता है
एक हरी पत्ती और हरी घास खाती है
यही जनता द्वारा जनता के लिये
जनता की सरकार कहलाती है
संवाद मे मीडिया है
बाजार की इनसाइक्लोपीडिया है
एक लड़की कपड़ा उतार कर
कपड़े का प्रचार कर रही है
पूंजी के पार्क मे मीडिया पहनकर गुजर रही है
सब मूल्य और तर्क तोड़कर बाजार के लायक बना दो
जो बिक सके वही टिक सके
अब तो हद है कि न्यूज़ चैनलो मे हो रहा दंगा है
अख़बार कैमरे की आंख से नंगा है
खबर यही है कि कोई खबर नहीं है
मंत्री जेल मे है मल्टीनेशनल अपने खेल मे है
मीडिया एग्जिट पोल कराती है
वही जाने क्यों इस तरह की हवा बनाती है
सरकार पकाती है सरकार खाती है
लगता है जमाना एक चश्में मे अंधा है
इसी लिए चमक रहा यह धंधा है
तिकड़म तो बस यही है
जिसने लोकतंत्र कमा लिया
झोपड़ी से महल बना लिया !
अनिल कुमार शर्मा

Tuesday, 6 May 2014

भद्र -मॉडल

उसके पास पीड़ा का फीता है

अलग -अलग साइज के पीड़ा को नापता है

और उसका कुर्ता -पायजामा सिल देता है

एक दिन मैंने देखा ---
वह कुर्ता सिल रहा था
शरीर के महत्वपूर्ण स्थानों पर कपडे गायब थे
मैंने पूछा -----
वह कौन ऐसा पीड़ित व्यक्ति है
जो ढकने वाली जगह को उघरना चाहता है
सदियों की गलती को सुधारना चाहता है
उसने कहा ---
इसने नंगे भूखों की फसल को खाया है
पीड़ा निचोड़कर नहाया है
इसकी सुदर्शनीय आकार की
एक कंपनी से संविदा है
जो अंतःवस्त्रों की बिक्री पर फ़िदा है
मखमली संस्कारों मे पली है
आज के मार्केट मे ढली है
उसी का यह वस्त्र है
एड -मार्केट का शस्त्र है
नंगे शीर्ष पर जाने को पागल है
अपने घर की भद्र -मॉडल है ।
अनिल कुमार शर्मा    05/05/2014

Monday, 28 April 2014

The air was blown
And clouds were shattered
This is a dry season
The sun is very hot
I am cold inside me
And see a dragon
Who gulps all social needs
Fertile land with weeds
Alas I need these needs
A concept, a value, a life
Moral, love and strife
Books for guidance
Problems for diffidence
A life to indulgence
And what is enjoyment
 Beyond physical needs
And spiritual gain
And what is survival breathe
And what is above life and beneath
My soul moves in a circle
I never surpass this confined home
What I seek I seek alone.
Anil Kumar Sharma 28/04/2014




Sunday, 6 April 2014

राजनीति के घूरे पर
आओ कुछ कूड़े डाले यार
सड़े कमल की रंगीन पँखुरियाँ
कटे हाथ की खुनी अंगुलियां
कुछ कीट पतंगे
कुछ मच्छर भुनगे
कुछ कुत्ते  कुछ सूवर है
चरित्र की बदबू कुछ ढके हुए
गांधी जी की टोपी में
कुछ धर्मों की पोथी में
कुछ सड़े समाजवाद के नाले में
कुछ विकसित घोटाले में
कुछ ईमान चिल्लाने वाले
उकठे पेड़ हिलाने वाले
सब कौवे हंस बने है
घटिया भी परमहंस बने है
जीते कोई या जाये हार
राजनीति के घूरे पर
आओ कुछ कूड़े डाले यार
अनिल कुमार शर्मा

Saturday, 5 April 2014

मध्यवर्गीदरिद्रों
मध्यवर्गीय दरिद्रों !खुश हो जाओ
शहर में सेल और महा सेल आया है
नयी आकांक्षाओ को फ़रमाया है
एक खरीदो तो एक मुफ्त है
इस बाज़ार में बड़ा लुफ्त है
ये अजीब लोग है
सिर्फ उपभोक्ता और उपभोग है
अब तो यहाँ लोन मेला लगता है
तुम्हारी औकात को किस्तों में ठगता है
इसी में सुबिधा जनक बीमा है
वही उत्पाद का ले लिया जिम्मा है
अब तो लोग बाज़ार में पैदा होते है
यहीं मिलते हैं यहीं खोते हैं
बाज़ार में जगते हैं बाज़ार में सोते हैं
लेनी में हँसते हैं देनी में रोते हैं
उधार में अपनी जिंदगी पिरोते हैं
कर्ज के बीज से खेत बोते है
अपने नीयत में जब हम बाज़ार होते है
जेब के बाहर कितने लाचार होते हैं
बाज़ार ने ऐसा डाका डाला है
घर की तिजोरी खाली है
मुरझाये चेहरों पर
कई ब्राण्डों की लगी होठ -लाली है
उपयोगिता और गुणवत्ता के सवाल पर
एक अजीब सा तर्क और वितर्क है
इसी शौकीनी में फँसा
दरिद्रों का मध्य वर्ग है
बेचने और खरीदने के नरक में
ढूढता अजीब सा स्वर्ग है
अनिल कुमार शर्मा ०५/०४/२०१४/

Tuesday, 1 April 2014

क्लिनिक
क्लिनिक के आगे दो कतार है
एक में बीमार है
दूसरे में एम ०आर ० है
एक दवा खायेगा
दूसरा दवा खपायेगा
और एक स्मार्ट  लड़का है
जो भीतर बाहर आता -जाता है
पैथोलॉजी का रास्ता दिखाता है
बीच में एक डॉक्टर बैठा है
जिसका गला टाई में ऐठा है
जो दिल को दिमाग में जाने से रोकता है
सोफा पर बैठा टेरियर भौकता है
मैं मरीज़ की हैसियत से जाता हूँ
और वहाँ पता हूँ
कंपनी के पैड पर
कंपनी की कलम से
कंपनी की दवा उभरती है
जिससे उन तीनों की हालत सुधरती है
चौथा मैं बीमार हूँ
इस कदर लाचार हूँ
पर्चे की दवा और दुकान
मेरी जेब पर भरी है
यह ऎसी महामारी है
जो इलाज से फैली है
किसी की जेब खाली
तो  किसी की भरी थैली है
 भाई साहेब !
आज यही क्लिनिक की शैली है
अनिल कुमार शर्मा
 
र हूँ

Friday, 7 March 2014

अंडा बोलता है
हज़ार बेईमानों में एक ईमानदार है
जो चोर -सिपाही वाली सरकार का सरदार है
इमरजेंसी की  बहु का   पक्षकार है
जो हज़ार छेदों वाली जर्जर नाव को खे रही है
और अंडा से रही है
अंडा कभी -कभी बोलता है
विचित्र रहस्य खोलता है
यह जन आंदोलन जो पसरा है
इससे  संसदीय प्रणाली को खतरा है
जनता की आवाज संसद से नीचे है
इस  चमन को  मेरे खानदान ने सींचे है
बांग्लादेश के  निर्माण में मेरे  परिवार का हाथ है
पूरा  देश हमारे साथ है
यह जन आंदोलन तो
संसदीय लोकतंत्र के साथ विस्वासघात है
भूखसान  पर बैठे योगासन वाले पर
आधी रात को लाठी चल गयी
यह बात पूरे  देश को खल गयी
योगी तरुणी के पोशाक में ढल गया
दुप्पट्टे में मुँह छिपाकर  निकल गया
मुझे भ्रम था योगी आत्मत्यागी है
महा विरागी है
नहीं जानता था इतना  आत्मानुरागी है
नाव मजधार में है
गड़बड़ी पतवार में है
तूफ़ान का अंदेशा है
मांझी का हाथ रस्सी में कसा है
लंगर अंडा में फंसा है
परिंदे पिजरे में बंद है
उनके चोंच में चारा है
यह देश बेचारा है
एक अदद ख़ानदान का सहारा है
अनिल कुमार शर्मा

Wednesday, 26 February 2014

टॉलस्टॉय   के भाई
एक सेमीनार में
हिन्दी के टॉलस्टॉय
और उनके भाई थे
टॉलस्टॉय ने खोमचा लगाया
भाई ने स्वाद हल्दीराम से उम्दा बताया
तुलसी  दास कबाड़ी थे
कबीर उम्दा खांडसारी थे
यही आलोचना है
दूसरी परम्परा को खोजना है
कालीदास की तरह
विशाल बृक्ष की शाखा पर बैठ कर
उसे अपने हिस्से की ओर से काट दो
असली को असली से ही बाँट दो
यही बात है
दूसरी शुरुआत है
परम्परा के खेत में
ऊगी कपास के रेशे से कुर्ता बनाया
उसमे नए ढंग के जेब और बटन लगाया
पहन कर टाँग दिया
उसे ही दूसरी परम्परा का नाम दिया
जिसमें तीन जेब हैं
'सच ' में फरेब है
ऊपर वाली जेब में कलम है
जिसमे न रोशनाई है
मुँह में जम्हाई है
दायें वाली जेब  भरी है
बांये वाली खाली है
जुबान में जुगाली है
ढ़ीली धोती के नीचे जूता
मजबूत पायदान पर टिका है
जहाँ पक्ष में विपक्ष बिका है
कमजोर रोशनी वाली
आँखों के बीच में एक नाक है
जिस पर चश्मा टिका है
चश्मे की नज़र पर
नाक की ऊचाँई  हावी है
यह व्यक्तित्व बड़ा प्रभावी है
इर्द -गिर्द सिंह और पूँछ हैं
जो नामर्द की मूँछ हैं
ये आलोचना तो सात अंधो की जुबानी है
जो एक हाथी के जिस्म की कहानी है
समग्र का खण्डित है
बहुत बड़ा पण्डित है
 अनिल कुमार शर्मा ----ग़ाज़ीपुर

Thursday, 20 February 2014

मेरे सवालो के सच
सच में ये बता
तुझे कितने जबाब मिलते हैं
जो सही में सच है
घास में दुबके लोग
जो सच तो देखते हैं
किन्तु कहते नहीं हैं
क्योंकि उनकी भाषा में
विचारधारा के पुट नहीं मिलते
किसी के मुँह में निवाला नहीं गया
तो उसका पेट खाली है
और परिभाषा में वह भूखा है
दो मुट्ठी अनाज का जुगाड़ न करके
अर्थव्यवस्था की खामी में
उसकी भूख को फिट करना
एक तरह का समाजवाद है
जहाँ जिनके पेट भर चुके हैं
वहाँ वे जुगाली करते हैं
कभी -कभी अनशन के लिए
चर्बी वाले अपना पेट खाली करते है ।
Of Time
Future is history to come
Past is history as done
Present tangles between both
Time is rough and smooth
Victories and defeats
Are causes of the same moments
By difference of percepts
Victory makes governments
History flows mainstream of conceit
We observe as per our heed
Time abounds needless sounds
Muses only chosen to be feed
Hark! a peace of moment
This narrow devil or saint
Chant the magic or preach the sermon
Meet an angel or a giant
It is flow of fire after fire
A science full of desire
Climbs a foot and down in mire.
           Anil Kumar Sharma

Monday, 17 February 2014

मुझे एक उल्टा आदमी मिला
जो बातें सीधी  सपाट करता था
गन्दगी देखकर सफाई के लिए उछलता था
और झाड़ू लेकर घूरे में घुस गया
घूरे में फँस कर झाड़ू टूट गया
यह घूरा वही के लोग बनाये थे
घरों को साफ कर गन्दगी फेंकते थे
सफाई के लिए दूसरे को देखते थे
यह उल्टा आदमी जोश में सीधा काम किया
बबूल में तोप कर आम दिया
छिलके के भीतर काँटा था
बे बुनियाद कि जमीन बाँटा था
 छोटे घूरे से निकलकर
बड़े घूरे कि ओर जा रहा है
भ्रम में होते हुए भरमा रहा है

 

 

Friday, 14 February 2014

एक दिन लेढ़ा गुरु ने बड़े दार्शनिक अंदाज में बताया
जनता द्वारा जनता के लिए जनता की सरकार में
पार्टियों की अहम् भूमिका होती है
जो चुनाव में जनता की चरण धोती हैं
पार्टी का वोट बैंक होता है
और नेता का स्विस बैंक होता है
प्रकट आरोपों -प्रत्यारोपों के बाद
एक गुप्त मतदान होता है
तत्पश्चात संख्या -पद्धति और
गुणा -गणित का आदान -प्रदान होता है
सरकार बनती है
गुप्त तरीके से बहुत कुछ करती है
प्रकट होने पर भ्रष्टाचार है घोटाला है
सफ़ेद हाथी पर लदा धन काला है
'प्राणायाम ' बेचनेवाला भी
इस पर डाका डाला है
जनता सभी को सुनती है
मन में कुछ गुनती है
जो मिलता है
उसी में से चुनती है
पार्टिओं के पास मोहनी -मंत्र है
अनोखा अपना लोकतंत्र है
अनिल  कुमार शर्मा 

Thursday, 13 February 2014

माहौल में सनसनी है
हवा चुप है
संदेह के कटघरे खड़े है
सवाल के ऊपर सवाल
प्रश्नचिन्ह भरे रास्ते
जहाँ हर जबाब टूटता है
आदमी आदमी को लूटता है
 किसी का खून कोई  चूसता है
फिर भी आदमी को  आदमी से उम्मीद है
विश्वास के दायरे संदिग्ध है
आम  आदमी के हाथ का कीचड़
 खास आदमी के मुँह पर पर छीटता है
एक उम्मीद उलीचता है
दृस्टि दिशाहीन है
चेहरे बहुत रंगीन है
मामले भी संगीन हैं
पश्चिम पर अंगुली उठाते
वह पूरब खड़ा था
आज पूरब पर अंगुली उठाते
वह पश्चिम खड़ा है
यह बहुरुपिया आदमी से निकलकर
आम आदमी में बड़ा है
नीयत में कुछ सड़ा है
जिसका सनसनी फैलाना ही
एक मात्र हथकड़ा है

Monday, 10 February 2014

मेरे शब्द
तुम्हारे शब्दों से
पनाह माँगते हैं
विनम्रता के खोल ओढ़े ये चुभचुभे
कलेजे में जब तीर की तरह चुभते हैं
मैं स्वयं के विस्फोट से आहत हूँ
मेरी आत्मा और मेरी शरीर
धर्म और कर्म में टकराती हैं
मै एक रस चाहता हूँ
ये दूसरा रस बनाती है
मेरी सरल स्वभाव की आत्मा
दूरूह जीवन के खोल में कुनमुनाती है
यह खोल ही पहचान है
इसी में स्वयं को बन्द पाती है
इसे तोड़ते हुए लगता है
जैसे खुद टूट रहा हूँ
स्वयं को स्वयं से लूट रहा हूँ
मेरे परिवेश और' मैं '
अभिन्न दिखते हुए भी कितने भिन्न हैं
भाव प्रसन्न किन्तु तर्क खिन्न है
दरवाजे से घुस कर दीवार से टकराता हूँ
इसी कोठरी में स्वयं को बन्द पाता हूँ
बाहर के शब्द-जाल
भीतर के शब्द को दबाते हैं
मेरी भाषा में बहुत से शब्द
अनकहे रह जाते हैं ।
 अनिल कुमार शर्मा

Thursday, 6 February 2014


The Inheritance of loss

                                                             The Inheritance of Loss:
Kiran Desai's novel ' The Inheritance of Loss' which won Man Booker prize2006, is an immature novel.Its plot and subject matter is not co-related, story moves in predetermined direction.The style of story telling defies the context and social background of characters.It is a mess of manufactured views about life,social norms and values which she has heard or read in books and news papers.In this novel no characters represents human values. All principal characters are devoid of identity, they are born in different societies, educated in western institutions and dreamed of other nations.They are aliens in the social set-up in which they live. They are cut off from their own backgrounds and values, they are ignorant of their own history.The contradictions in characters are arbitrary and development is not normal, they seem to be unaware of their own historical background and society.
       There are four main characters in the novel, Jemubhai Popatlal Patel; the judge , his grand daughter Sai, his cook, Pannalal,and Biju, son of cook.The story is set in Kalimpong,  the far north eastern part of India. Kalimpong is affected by movement of GNLF. Local people demand for a separate Gorkhaland . Some part of story is set in USA where Biju suffers life of an illegal immigrant . Conditions of these two nations are compared simultaneously . In kalimpong there are strikes, arson ,loot, local Nepali people are grabbing properties of non Nepali people.There is no law and order.Biju struggles in America for green card. With the help of his friend Saeed, he manages to get green card . Biju comes to India . He lands at Calcutta. There was disturbance, he does not find any traffic to go Kalimpong. Anyhow he gets a taxi to Kalimpong but he is cheated by taxi driver. The taxi-driver , in the mid way, stops his taxi,and robs everything from Biju. He loots even clothes and shoes of Biju. The driver leaves him with mere underwear and gives him a nightgown of a woman to cover his body. This is the story of misfortunes of unfortunate persons in this book, the writer has justified her title of novel " The Inheritance of loss".
     The principal character of the novel is Jemubhai Popatlal Patel. He was the only man of his community who had gone to England for study. He applied for service of ICS and was selected as a judge. After retirement he purchased a house in Kalimpong . He has a pet dog named Mutt.As the story goes on the judge flashed back his personal history. He is an uprooted person,he hates his history ,belief,culture etc. He likes western manners. He thinks Indian culture and civilization is a very degraded thing. He blindly runs after everything which is western and condemns everything which is Indian. He is married with an Indian girl. With the money of dowry he went England and came in western temperament. He dislikes his wife Nimi. He is awfully cruel to her, at last he drove her to her parents house, where she gave birth to a girl child. The judge hates this new born but he manages for her education in a convent school. That girl elopes with an orphan boy to Russia. They are killed in a plane crash. Sai is daughter of judge's daughter. Sai studies in a convent run by donations, the expenses of her sturdy is being borne by the judge, but he never visits her. She is expelled from convent and comes to her grand father in Kalimpong. She sees that the judge is very disturbed after her arrival. The judge eats western food,plays chess,drinks imported wine and plays with dog Mutt. One day his dog is lost, he is very disturbed due to loss of this dog. He does not belief in God but prays for dog, he also goes to sorcerer --"The judge got down on his knees,and prayed to God , he, Jemubhai Popatlal, the agnostic, who had made a long journey to jettison his family's prayers; he who had refused to throw the coconut in the water and bless his own village all those years on the deck of SS stathnaver ----(p301)
     " then he got up . He was undoing his education, retreating to superstitious man ,making bargains, offering sacrifices, gambling with fate,daring whatever out there"(p301).
     Jemubhai's cruel behavior with his wife is tormenting----"For the first time he hit her , although he had wanted to before and fought the urge for sometime . He emptied his glass on her head, sent a jug of water swinging into the face he no longer found beautiful, filled her ear with leaping soda water . The, when it was not enough to assuage his rage he hammered down with his fists,raising his arms to bring down her again and again, rhythmically,  until his own hands were exhausted and his shoulders next day were strained sore as if from chopping wood, he even limped a bit ,his legs hurting from kicking her"(p304).
  " the anger ,once released, like genie from a bottle, could never be curtailed. The quieter she was , the louder he shouted, and if she protested , it was worse. She soon realized that whatever she deed or do not do, the outcome was the much same. His hatred was his own creature; it rose and burnt out, reappeared of its own accord; and in her he sought only of its justification, its perfection.In this purest moment he could imagine himself killing her"(p305). He could bear her face no longer, bought her a ticket and returned her to Gujarat. After six months Nimi gave birth to a girl child. They hoped that this baby would bring the father (judge) back to their community. Jemu sent money with a letter " It will not be suitable ". He replied "My work is such, no schools, constant travel....". Nimi's uncle drove his niece from the door saying " You are your husbands responsibility". Nimi lived her rest of life with a sister who had not married well.Jemu's father came to before him but all effort was useless. His father returned without any result.
   when his dog is lost ,the judge laments" He could not conceive of punishment great enough for humanity .A man was not equal to an animal, not one particle of him. human life was stinking, corrupt and meanwhile there were beautiful creatures who lived with delicacy on the earth without doing anyone any harm. we should be dying , the judge almost wept(p292). In this novel the personality of judge is very mean, selfish . He does not love his family, when his daughter elopes with an orphan boy , judge felt relief--" he had condemned the girl to convent boarding schools, relieved when she reached a new height of uselessness and absurdity by eloping with a man who had grown up in an orphanage. Not even the relatives expected him to pay any attention to her again"(p308) He also hates his grand daughter Sai---" Sai had arrived so many years latter, and although he had never properly admitted the fact to himself, he knew he hoped an unacknowledged system of justice was beginning to erase his debts"(p308)
   The depiction of character of judge is unnatural. It could be admitted that he would be cruel to his wife but it could not be expected that he would be hateful to his own daughter and grand daughter. he loves a dog too much but not a human being. He is an educated man and a high official . Thus character sketch of judge is artificial and unnatural.
        The second central character of novel is Sai. She is grand daughter of the judge. Her parents were killed in a plane crash. She was very little at the time of accident . The nun of convent consoled her-" Very sorry" said sister Caroline, "Very sorry to hear news, Sai . You must have courage"
" I'm an orphan,"Sai whispered to herself, resting in the infirmary."My parents are dead. I am an orphan". She hated the convent , but there had never been anything else she could remember.(p27). The convent is being run by donations . As time passes the number of donors declines, there is want of fund. Sai was a special problem. The older nuns remembered her mother and the fact that the judge paid for her keep but never visited (p28). When Sai's parents eloped , the family in Gujarat' feeling disgraced, disowned her mother.In a country so full of relatives, Sai suffered a dearth.There was only a single listing in the register under " Please contact in the emergency". It was the name of Sai's grandfather , the same man who had once paid the school fees (p28). The environment of convent was as such--" The system might be obsessed with purity, but it excelled in defining the flavor of si. There was a titillation of unearthing of forces of guilt  and desire. needling and prodding results. This Sai had learned. This underneath, and on top of flat creed: cake was better than laddoos, fork spoon knife better than hands, sipping the blood of Christ and consuming a water of his body was more civilized than garlanding a phallic symbol with marigolds. English was better than hindi"(p30). Sai is educated in contradictions , she comes to her grand father , who is upset by her arrival. The judge arranges for her tuition of mathematics and science. Sai falls in love with her tutor Gyan. Gyan joins movement of Gorkhaland led by GNLF. He ignores Sai and condemns for her manners, he also hates her. When Gyan does not come to Sai for long time . Sai visits his village where Gyan misbehaves with her . Sai is very frustrate to learn that Gyan has cheated her and her grandfather also does not like her. Sai represents false culture of elite class and Gyan represents patriotic temperament for his motherland.

Friday, 17 January 2014

आरक्षण वाली दूधपिल्ली के लिए चीखो
तुम्हारे मुँह में भूसा ठूँसकर
आँख में धूल झोंक कर
जनतंत्र चलाया जा रहा है है
तुम्हारे देखने के लिए
पार्टी के घिसे पहिये का पंचर साटने वाले
विधायक का महल बनाया जा रहा है
देखो समृद्धि दिखायी दे रही है
आरक्षण की आरोही संगीत सुनाई दे रही है
दीन बनो हीन दिखो
आरक्षण वाली दूधपिल्ली के लिए चीखो
इसी दायरे में संविधान लिखो
स्तनविहीन जननी लोरी सुना रही है
हवा में चम्मच हिला रही है
माहौल में बुलबुले मिला रही है
खाली उम्मीद पर जिला रही है
पानी में लाश फूल रही है
 काँटों से उलझकर जिंदगी वसूल रही है
तत्काल के मोहरे पर  दूर के दाव है
यह एक अनवरत नाव है
जिसे खेना  कुर्सी की मज़बूरी है
यह हवेली सदा अधूरी है
यह इतना गाढ़ा रंग है
जहाँ रास्ता ज्यादा तंग है
नदी सूख रही है
बाँहे भी दूख रही है
सवेरा तराशने वाले
रात में ही जुगाड़ लगाते है
बासी रोटी पर गरम मक्खन लगा कर खाते है
ठण्ढे तवे पर गरम घास की रोटी सेंक रहे है
जातियों में आरक्षण पर आरक्षण फ़ेंक रहे है
दूध के लिए छटपटाते दुधमुहों के लिए
गन्दी कटुता में पानी लिखो
आरक्षण वाली दूधपिल्ली के लिए चीखो ।
             अनिल कुमार शर्मा
               ग़ाज़ीपुर


Wednesday, 15 January 2014

   कॉमरेड का  असर
वो ऐसा गरीब ढूढ़ते है
जो लड़ सकें
और लडने के सिवा न कुछ कर सकें
वो लड़ाते रहें और ये लडते रहें
"तुम्हारे भूख की वजह भरे पेटों की शरारत है "
 यही  समझाते हुए
एक ऎसी दुनिया  गढ़ते हैं
जहाँ संघर्ष के सिवा कुछ नहीं है
कमजोर टूटी पसलियों पर
सिद्धांतों के कफ़न का मरहम लगाते हुए
ये  इंकलाब के नारे बड़े बेचारे बेचारे लगते है
हरे पत्तों को तोड़ कर सुखा दो
और उसमें आग लगा दो
समझ लो सत्ता जहर है
भूखे पेटों के लिए
उसे बंदूक से उड़ा दो
हम नयी सत्ता रेशमी फंदों वाली लायेंगे
जिसमे पकवानों के इस्तेहार होंगे
तुम्हारे मुँह में टपकते लार होंगे
भूख तो महसूस होगी
किन्तु सताएगी नहीं
क्योंकि जहर का डर होगा
यही कॉमरेड का असर होगा
    अनिल कुमार शर्मा  

   कुलगीत के मीत
महामना के    पावन    मन्दिर      में ,
चढ़े     हुए     तुम     ज्ञान     कुसुम ।
सुरभित    होकर     फैल     रहे  हो ,
मधुर   मनोहर    विकसित      तुम ।
शिव -नगरी ,  काशी      की  गरिमा ,
सारनाथ   के       बौद्ध      विहारों में ।
दर्शन ,  कला ,   ललित   विधा    से ,
ज्ञान -विज्ञान ,   संगीत    बहारों में ।
स्मित   उपवन   के   दल प्रफुल्लित ,
परिसर      में     तुम    खिले   रहो ।
महामना   के     पावन     कुल   की ,
स्निग्ध       परम्परा      बने  रहो ।
महाकाय  महामना  के  फैले हम ,
जड़ ,   तना ,   कुसुम ,      पत्ते  है ।
विविध   सुमन    के   मकरंद चुने ,
पर    एक   मधुकोश   के   छत्ते है ।
 सिंघद्वार    का    तोरण  देखकर ,
मुझसे मिलता   निष्छल अतीत ।
होता   वर्त्तमान   छल   सा प्रतीत ,
मैं गूँजता मेरे कुलगीत के मीत । ।
  ------अनिल कुमार शर्मा

Tuesday, 14 January 2014

कॉमरेड तुम बात सही कहते हो
किन्तु उस पर लाल रंग पोत देते हो
यहाँ तक कि मियां बीबी के झगड़े में भी
वर्ग -संघर्ष जोत देते हो
तुम्हारी आँखें पुरानी हैं
और चश्में भी पुराने हैं
यह नया दौर है
नए ज़माने हैं
बुर्जुआ राख है पूँजीपति हरा है
सर्वहारा देता पहरा है
बाज़ार के चकमक में
जगमग जगमग भरा है
शोषित कौन है और शोषक कौन है
यह बताना मुश्किल है खोल में
रजाई कौन है और तोसक कौन है
अब तो मौका मिलने की देर है
मालिक भी  ठगता है
मजदूर भी ठगता है
फिर भी तुमको एक शोषक
और दूसरा शोषित लगता है
अभी तुम उत्पादन और वितरण में भूल रहे हो
सरप्लस वैल्यू में झूल रहे हो
अपनी आइडियोलॉजी में बेहद खुश हो
क्योंकि दिमाग में पाले  एक रूस हो
हर मंदी के बाद अमेरिका ढहता है
हर कॉमरेड यही कहता है
पुंजीवाद बहुत बड़ा धोखा है
मार्क्सवाद चटनी और चोखा है
रोजी -रोटी गायब है
यह तरीका बड़ा नायब है
हिलते रहो हिलाते रहो
पानी मार -मार कर
क्रांति की आग जिलाते रहो
इंकलाब गाते रहो ।
  ---------अनिल कुमार शर्मा
I woe a mirror
Which shows my face as it is
I want to be fit where I never fit
And claim it as my struggle
Light is mine and dark is others'
I blame my fall on brothers
This I expose myself inside
But dare not to come outside
I am covered in these two faces
One what I am indeed and
Other what I want to show
 O my mirror! you are my foe
You show me my tip to toe
With my arrow and bow
And my fickle hands go
In search of my true mine
I dodge myself to me
And made endeavor to flee
But where I go from my me
In this terror
I broke me mirror.


Monday, 13 January 2014


दिल्ली हिली , कुछ आम आदमी में मिली
कुछ पानी मुफ्त है कुछ रियायत में बिजली
घूसखोरों के कुछ कान खड़े है
यही कुछ भ्रष्टाचार की   जड़े है
बात यही है कि अपने  घरों की गन्दगी
रास्ते में   फ़ेंक कर उसपर चलते है
अपने दरवाजे पर फिसलते है
अधिकार की बात पर उछलते है
कर्तव्य की बात पर
पतली गली से सरकते हैं
अब वोट लैपटॉप है ,बिजली है , पानी है
मतदाता याचक , पार्टी दानी है
अब जनतंत्र की यही कहानी है
निरीह आदमी के पास एक वोट  है
सत्ता पर करता चोट है
यह आदमी कभी जनता होता है
तो कभी नेता होता है
कभी लेता होता है
तो कभी देता होता है
कभी दुत्कारा होता है
तो कभी चहेता होता है
कभी सिंहासन पर तो कभी
नंगे सड़क पर लेटा होता है
कभी बाप होता है
तो कभी बेटा होता है
अपने देश की किस्मत क्या कहें
देश वाला देश पर रोता होता है ।
          -----------अनिल कुमार शर्मा
       ग़ाज़ीपुर   



Sunday, 12 January 2014

सवाल चुप, जबाब उदास है
ज़माना बिंदास है
ज़मीन से बरकते हुए
कोई ज़मीन गढ़ रहा है
यह ज़माना एक अजीब
किताब पढ़ रहा है
फ़ुरसत किसे है
पुरानी बात  दोहराने की
हर जगह बिछे बिस्तर मिलते हैं
जरुरत नहीं आशियाँ सजाने की
हर जगह घरों के टुकड़े हैं
रिस्ते टूटे बर्तनों की तरह  बिखरे है
उत्तर -आधुनिकता में इतने निखरे है
कि साबुत कुछ भी नहीं बचा
मूल्यहीन जिंदगी तुम्हारी क्या खता?
संस्कृति की खोल में बंद थी
अब नंगी होकर बाहर आ रही हो
लगता है ग्लोबल होती जा रही हो
अब आदमी काफी उदार है
क्योंकि सामने बाज़ार हैं
सरकार को जिसका इंतजार है ।


            मेरी हिन्दी
मेरी हिन्दी में कुछ हिन्दी वाले हैं
जो अपने कद की खड़ी किये दीवालें हैं
हिंदी बह -बह कर रुक जाती है
इन हिंदी वालों के चंगुल में छटपटाती है
मचा हुआ घोर संग्राम है
इधर भी सिकिया पहलवान है
उधर भी सिकिया पहलवान है
आलोचक बूढ़ा लेखक जवान है
मुँह में चबाता बनारसी पान है
चापलूसी की चटनी, पुरस्कारों की पकौड़ी
पुरस्कृत पुस्तकों के पन्नों पर खायी जाती है
हिंदी में यही तरकीब अपनायी जाती है
लेखक पटाखा है लेखिका फूलझड़ी है
हिंदी इन्हीं कर्णधारों के पल्ले पड़ी है
जैसे राजनीति में जात है
वैसे साहित्य में कई पाँत है
जो हिंदी में जन्मजात है
कोई छींकता है तो उसमें हिंदी है
चिल्लाता है गुर्राता है
जगह -जगह से विचार चुराता है
कई जीभों में लपेटकर
मेरी हिंदी में अपना बताता है
क्योंकि हिंदी हिंदी से बाहर नहीं जातीहै
इन्ही बंद कोठरियों में छटपटाती है
जिस पर लटका हुआ बहुत बड़ा ताला है
मेरी हिंदी में विचित्र हिन्दीवाला है
चाभी उसके पास है
उसे इतना विश्वास है
कि हिंदी उसकी है
बजता चुटकी है
आवाज हिंदी हो जाती है
यही लिखी जाती है
यही पढ़ी जाती है
मेरी हिंदी इन्ही दीवारों में गढ़ी जाती है ।
--------अनिल कुमार शर्मा


Saturday, 11 January 2014

खुले दरवाजे पर दस्तक दिया
वह बंद हो गया
उदार आदमी भी
अब इतना तंग हो गया
सवाल के सामने सवाल
और जबाब के सामने जबाब
मैदाने जंग हो गया
आदमी की फितरत में
खुला कलेजा बंद हो गया
किताबें खोलता हूँ
चमक आती है उम्मीद जगती है
जैसे तेज तूफान में
कोई ढिबरी जलती है
वह बंद दरवाजा खुलता है
उसका साँकल फिर
बंद होने के लिए झूलता है

Friday, 10 January 2014

हॉस्पिटल में पैदा हुआ
तबादले की मार सहता हुआ
किराये के घरों में रहा
होटलों में जन्मदिन से लेकर
विवाह ,तलाक ,पुण्यतिथि मनाता रहा
पंद्रह अगस्त ,छब्बीस जनवरी पर
जन-गण ,मन -गण गाता रहा
भारतमाता के जोरदार नारे लगता रहा
 सरकारी मुलाजिम का वेतन पाता रहा
बच्चों को पार्क में घुमाता रहा
जिंदगी में खुद को भुलाता रहा
दोस्तों से ग़मे -शिकवा गाता रहा
बेबुनियाद का पिकनिक मनाता रहा
कभी अस्पताल ,कभी दुकान , कभी मंदिर
बैंक से लेकर दफ्तर जाता रहा
सरकारी फरमान बजाता रहा
इसी तरह जिंदगी के अरमान सजाता रहा
आज इस उम्र के पर हूँ
खुद में नागवार हूँ
आज जिंदगी दवा पर चल रही है
जैसे सरकार किसी हवा पर चल रही है
हॉस्पिटल के बिस्तर पर साँस गिन रहा हूँ
यहीं पैदा हुआ था
आज यहीं छीन रहा हूँ
अब तो योजनाओं में विकास है
न खुश है न उदास है
भाई साहब मिडिल क्लास है ।

Thursday, 9 January 2014

हॉस्पिटल में पैदा हुआ
तबादले की मार सहता हुआ
किराये के घरों में रहा
होटलों में जन्मदिन
आदमी के भीतर हम आदमी कितने है
समय के चोट खाये मुरझाये फूल जितने है
काँटों के बहार में फँसी ये पँखुरियाँ
घायल बसंत के दर्द भरे घाव कितने है
मुझे हर घड़ी वह आदमी याद आता है
जो सिर्फ़ आदमी ही रह गया
आदमी  की देह ओढ़े
तमाम भेड़ियों की कहानी कह गया
मेरी मिट्टी मुझे तुझ पर भरोसा है
वह आदमी जरुर मिलेगा
इस बंजर में कोई फूल खिलेगा ।

Wednesday, 8 January 2014

आदमी के भीतर हम कितने आदमी है

चलो किसी की रब से बात तो होती है
रूह में ही सही मुलाकात तो होती है
कितने मंज़र गुजर गए आसमां के पार
कम से कम रब की जमीं पर बात तो होती है
मुझे दोस्ती और दुश्मनी में फर्क नहीं मालूम
एक हवा सी होती है एक ज़ज्बात सी होती है
किसके हिस्से में कितनी करामात सी होती है
 कहीं आँसू कहीं शबनम कहीं क़ायनात सी होती है
शुक्र ख़ुदा का कितने बयानात सी होती है



Tuesday, 7 January 2014

What I say  in principle
But not do in practice
To whom I say
And for whom I do
Always creates a confusion
I delve in reality better than illusion
Teachers are good
And my learning is better
But when I step in grass
Drops of mud sling on my feet
I wonder this ideal defeat
This is the bare truth of my life
What my rule fed behavior hide
I always say such and such
But do always as I had done
I am fed-up in these two poles
I hide my self in many holes
I disguise to myself
This is the wonder
I never seek any help
Anil Kumar Sharma
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Friday, 3 January 2014

ये खबरें आँधी सी चलती हैं
अखबारी नालों में
गंदे पानी सी बहती हैं
सड़े फलों के छिलके सी रहती है
इसकी बदबू से
हर सुबह महकती है
चिड़िया कहाँ चहकती है
इसमें कुछ नेता हैं कुछ चमचा हैं
कुछ खेल -खिलाड़ी हैं
कुछ बुद्धू और जुगाड़ी हैं
कुछ नंगें हैं कुछ नंगी हैं
कुछ भरे -पूरे ,कुछ भंगी हैं
सच कहते कुछ झूठे हैं
कुछ जनता की किस्मत लुटे हैं
कुछ साबुत हैं कुछ टूटे हैं
भगवान तुम्हारे धोखे में
बेटी की इज्जत लुटे हैं
हत्या है दंगे है
नए पुराने हथकण्डे हैं
क्या अखबारी दुनिया के -
हम बने कीट -पतंगे हैं ?
माहौल सँवरने में आए
कितने -कितने फंदे हैं
देखो कितना दिखता है
लिखता कम ज्यादा चीख़ता है
खबरों से ज्यादा अब
प्रचार यहाँ दिखता है
हर हाथों में रोज यहाँ बिकता है
नहीं कहीं कुछ टिकता है ।

ये खबरे आँधी सी चलती हैं
अखबारी नालों में
गंदे पानी सी बहती

Wednesday, 1 January 2014

मैं मौत को जीतने चला
शरीर को पीटने चला
शरीर के तत्व बिखर गए
आत्मा में निखर गए
एक ज्योति जल गयी
 उसमें शरीर पिघल गयी
देश काल विलीन हो गया
अमरत्व में लीन हो गया
मैं जहाँ हूँ वहाँ नहीं भी हूँ
एहसास होने लगा
उसी प्रकाश में
मेरा अंधकार खोने लगा
प्रभु तुमसे अभिषिक्त हूँ
स्वतः प्रदीप्त हूँ ।