Wednesday, 3 September 2014

कविता के गाँव में
कविता के गाँव में
कई तरह की कलम उगी  थी
कोई  फूली थी कोई पचकी थी
कोई स्याही में डूबी थी
कोई लिखकर टूटी थी
प्राचीन नदी के किनारे
एक प्राचीन कुटी थी
अबूझ भाषाओँ की चीख
समय के जंगल में गूंजी थी
सूने कान में आवाजों के डोरे
सूत्र बन जिह्वा पर बोले
ध्वनि के चित्र खोले
कविता विचित्र हो
संतप्त जीवन की
आह्लाद भरी मित्र हो
वाल्मीकि नहा रहे थे
दो परिंदे पेड़ पर हनीमून मना रहे थे
ब्याध ने बाण छोड़ दिया
कॉमेडी को ट्रेजेडी में मोड़ दिया  
कवि हृदय की आह छूट पड़ी
कविता वही से फूट पड़ी
यह सद्पीड़ा की अनुभूति है
चेष्टाओं की विभूति  है
कविता शिशु के मुँह में
माँ के चुचूकों की प्रथम धारोष्ण दुग्ध है
जो उसके  किलकारियों से अतिशय मुग्ध है
अनिल कुमार शर्मा  ०४/०९/२०१४/


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