Friday, 12 September 2014

शब्दों में कुछ अर्थ पहन कर
विचित्र अंदाज़ में इतराता हूँ
अनर्थ की मेड़ पर
मुरझाये पुष्प की तरह  छितराता  हूँ
जड़ से  लेकर पत्ती तक
ध्वनि चित्र बनाता हूँ
समीर समेटे तेरे कर्णपटह तक आता हूँ
 दोस्त  अपने अंदाज़ में कुछ गाता हूँ
महक उतनी नहीं है जितनी चाहिए
जिससे कि मिज़ाज़ खुशनुमा हो
इस दर्द के दौर में कौन है
जिसे  आह की  भाषा नहीं आती
पीड़ा  की  परिभाषा नहीं आती
उम्मीद गुजर जाने के बाद भी
फिर से उसे आने की आशा नहीं आती
विगत स्वप्न के आकर्षण की
कोई अभिलाषा नहीं आती
 संवेदित अधरों के कोनों पर
पुनः पुनः   प्रत्याशा नहीं आती ।
अनिल  कुमार शर्मा  12/09/2014








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