Monday, 22 September 2014

अमलतास की खिली कली सी
पीली सरसों के फूलों सी
पंकज पंखुरियों के अधरों में
मुक्ता माला की दन्तावलियां
कुछ बिहस रहे रस भींगे से
मोहक मधुर रंग  राग भरे
मन   मयूर नाच रहा है
अतिशय आनंदित अनुराग भरे
मधुघट सी मदहोश प्रिये
 नयनों के दो प्यालों   से
काले केशों के व्यालों से
विष  आहत   कर   देती हो 
मैं मुर्क्षित तेरे आकर्षण में
हर पल खींचता  आता हूँ
प्रकृति तुम्हारी माया में
पाशबद्ध जी जाता हूँ
अनिल कुमार शर्मा 23/09/2014



 




 
 

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