Wednesday, 2 July 2014

थोड़ी भूख बाकी रहने दो
पूरा पेट मत भरो
कुछ दिमाग खाली रहने दो
जहाँ नए विचार प्रवेश पा सके
नए स्वाद को इत्मीनान से खा सके
अब दुनिया ऊबी -ऊबी सी है
गहराई में गहरी डूबी -डूबी सी है
ढाक के तीन पात जैसी
मुरझाकर झुकी -झुकी सी है
ये किस प्रगति का गीत गा रहे है
अपने नस्ल का क्यों बीज खा रहे है
हरे -भरे खेत में मुरझाया खेतिहर खड़ा है
उसके उम्मीद से क़र्ज़ का ब्याज बड़ा है
फसल को पानी देने में उसका पानी मर गया
गमछा फट गया कुर्ता भी सड़ गया
क्यों नंगा सीना ताने खड़ा है
बिना बेंट का फावड़ा है
बीमार बीबी खेत में खिलाती है
कुँवारी बेटी खेत में रुलाती है
महँगाई यमदूत की तरह बुलाती है
बाजार उसकी आँखे खुजलाती है
समस्याएं टाँग हिलाती है
एक खुराक जिंदगी मौत को पिलाती है
यह मामला भी खूब है
लुभाती हुई ऊब है
राजनीति जनेऊ पहनकर
उससे व्रत करा रही है
अच्छे दिन दिखाकर
वोट का दान पा रही है
पूरे खेत समेत उसको खा रही है
अनिल कुमार शर्मा  02/07/2014

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