Saturday, 19 July 2014

लोगों को मैंने हँसते देखा रोते देखा
पैर पसारे सोते देखा
अपने -अपने में खोते देखा
इस दुनिया के कोने कोने में 
रोज चीर -हरण होते देखा
गिरे हुए इंसानो के
कुकर्मों को होते देखा
दानवता को जीते देखा
मानवता को मरते देखा
हम किस खेत के मूली है
हम किस व्यवस्था के कुली है
जिसको ढोते रहते है
हम तो रोते रहते है
अनिल कुमार शर्मा १९/०७/२०१४


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