Thursday, 3 July 2014

आप कह कर चुप हो गए
मैं सुनकर चुप हो गया
चुप होने के अलावा कोई चारा नहीं था
कुछ देखने लायक नज़ारा नहीं था
पेट और जेब के अनुपात में
सरकारी बटुआ खाली है
सपने दिखाने के दांव -पेंच में
बनायीं गयी हवा अब जाली है
कहर कहने से कम नहीं होता
हक़ीक़त जानने वाले के ज़ेहन में
हक़ीक़त में कोई गम नहीं होता
सूखाग्रस्त सूखे खेतों के परे
साहबों के गमलों में खिले गुलाबी आँकड़े
ज़मीन से हट कर कुछ और बोलते है
विकासशील देश में विकास खोलते है
पूंजी निवेश के जुगाड़ में
पाला बदल कर बोलते है
दुकान और देश के बीच जनता सवाल हो
आलू ,प्याज ,तेल में बेहाल हो
उसे फायदे के हिसाब से बेचने का हक़ है
मुझमें खरीदने की कूबत नहीं रही
अब सारी योजनाये बाज़ार में बही
उसे तो बस दिखाने के लिए दुःख है
मेरे भूख के खाते में भूख ही भूख है
पकवानों के इश्तेहार से छला गया
अब मैं लार टपका रहा हूँ
कुछ कहने में ज्यादा सकपका रहा हूँ
अनिल कुमार शर्मा (04/07/2014)

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