Wednesday, 21 May 2014

कुछ सवाल खुश्नुमे थे
अब कुछ जबाब खुश्नुमे  है
जो फूल टहनी पर लगे थे
उनके हार भी खुश्नुमे है
फूल तो खिल गया
कली मुरझा गयी
उम्मीद में उम्मीद खा गयी
रोशनी इतनी तेज है
जहाँ कुछ दिखाई नहीं देता
आशीर्वाद के दौर में
दुखड़ा सुनाई नहीं देता
पानी में पानी मिलाते हुए
पानी का रंग दिखाई नहीं देता
हमें उनकी फ़िक्र ज्यादा है
जिन्हें फ़िक्र करने आता ही नहीं
समझ के दायरे में इसे 
कोई  समझ पता ही नहीं
जंगल वही है बस शेर दूसरा है
अब देखना है
कितना खोटा है
कितना खरा है
अब इस दौर में
कितना सूखा है कितना हरा है
अनिल कुमार शर्मा 22 /05 /2014

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