Thursday, 8 May 2014

जिसने लोकतंत्र कमा लिया   
अब तो सवाल यहाँ खड़ा है
जन प्रतिनिधि का भ्रस्ट होना
और जनता का वोट देना
दोनों बराबर है
किन्तु यहाँ एक के सिर पर दोष है
बाकी निर्दोष हैं
सत्ता के सवाल पर
जनता और नेता चुप हैं
स्वरुप विद्रूप है
वोट देने और लेने का लोकतंत्र है
नयी सोच का यही नया मन्त्र है
अब तो पार्टी का वोट बैंक होता है
और नेता का स्विस बैंक होता है
विकास के बजट मे घोटाले है
जिन्हे बड़ी ईमानदारी से हम वोट डाले है
सरकार निजी निगम के दबाव मे है
जनता अपने जातिगत स्वभाव मे है
यह मूल्य -हीन अर्थव्यवस्था
डिब्बे बन्द पूंजी तलाश रही है
उदारीकरण की वातानुकूलित हवा मे खाँस रही है
मीडिया उससे टपकते मधु को चाट रही है
बिककर खबर पाट रही है
अब तो एक छोटे से कमर्शियल ब्रेक के बाद
एक बहुत बड़ा बलात्कार होता है
मीडिया में इसी तरह का चमत्कार होता है
यह लोकतंत्र एक खिलौने की दुकान है
जहाँ बाघ के पीठ पर बकरी रख दी जाती है
बाघ गुर्राता है बकरी मिमियाती है
वाणी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पाती है
एक सीना फाड़कर खून पीता है
एक हरी पत्ती और हरी घास खाती है
यही जनता द्वारा जनता के लिये
जनता की सरकार कहलाती है
संवाद मे मीडिया है
बाजार की इनसाइक्लोपीडिया है
एक लड़की कपड़ा उतार कर
कपड़े का प्रचार कर रही है
पूंजी के पार्क मे मीडिया पहनकर गुजर रही है
सब मूल्य और तर्क तोड़कर बाजार के लायक बना दो
जो बिक सके वही टिक सके
अब तो हद है कि न्यूज़ चैनलो मे हो रहा दंगा है
अख़बार कैमरे की आंख से नंगा है
खबर यही है कि कोई खबर नहीं है
मंत्री जेल मे है मल्टीनेशनल अपने खेल मे है
मीडिया एग्जिट पोल कराती है
वही जाने क्यों इस तरह की हवा बनाती है
सरकार पकाती है सरकार खाती है
लगता है जमाना एक चश्में मे अंधा है
इसी लिए चमक रहा यह धंधा है
तिकड़म तो बस यही है
जिसने लोकतंत्र कमा लिया
झोपड़ी से महल बना लिया !
अनिल कुमार शर्मा

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