Sunday, 6 April 2014

राजनीति के घूरे पर
आओ कुछ कूड़े डाले यार
सड़े कमल की रंगीन पँखुरियाँ
कटे हाथ की खुनी अंगुलियां
कुछ कीट पतंगे
कुछ मच्छर भुनगे
कुछ कुत्ते  कुछ सूवर है
चरित्र की बदबू कुछ ढके हुए
गांधी जी की टोपी में
कुछ धर्मों की पोथी में
कुछ सड़े समाजवाद के नाले में
कुछ विकसित घोटाले में
कुछ ईमान चिल्लाने वाले
उकठे पेड़ हिलाने वाले
सब कौवे हंस बने है
घटिया भी परमहंस बने है
जीते कोई या जाये हार
राजनीति के घूरे पर
आओ कुछ कूड़े डाले यार
अनिल कुमार शर्मा

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