मध्यवर्गीदरिद्रों
मध्यवर्गीय दरिद्रों !खुश हो जाओ
शहर में सेल और महा सेल आया है
नयी आकांक्षाओ को फ़रमाया है
एक खरीदो तो एक मुफ्त है
इस बाज़ार में बड़ा लुफ्त है
ये अजीब लोग है
सिर्फ उपभोक्ता और उपभोग है
अब तो यहाँ लोन मेला लगता है
तुम्हारी औकात को किस्तों में ठगता है
इसी में सुबिधा जनक बीमा है
वही उत्पाद का ले लिया जिम्मा है
अब तो लोग बाज़ार में पैदा होते है
यहीं मिलते हैं यहीं खोते हैं
बाज़ार में जगते हैं बाज़ार में सोते हैं
लेनी में हँसते हैं देनी में रोते हैं
उधार में अपनी जिंदगी पिरोते हैं
कर्ज के बीज से खेत बोते है
अपने नीयत में जब हम बाज़ार होते है
जेब के बाहर कितने लाचार होते हैं
बाज़ार ने ऐसा डाका डाला है
घर की तिजोरी खाली है
मुरझाये चेहरों पर
कई ब्राण्डों की लगी होठ -लाली है
उपयोगिता और गुणवत्ता के सवाल पर
एक अजीब सा तर्क और वितर्क है
इसी शौकीनी में फँसा
दरिद्रों का मध्य वर्ग है
बेचने और खरीदने के नरक में
ढूढता अजीब सा स्वर्ग है
अनिल कुमार शर्मा ०५/०४/२०१४/
मध्यवर्गीय दरिद्रों !खुश हो जाओ
शहर में सेल और महा सेल आया है
नयी आकांक्षाओ को फ़रमाया है
एक खरीदो तो एक मुफ्त है
इस बाज़ार में बड़ा लुफ्त है
ये अजीब लोग है
सिर्फ उपभोक्ता और उपभोग है
अब तो यहाँ लोन मेला लगता है
तुम्हारी औकात को किस्तों में ठगता है
इसी में सुबिधा जनक बीमा है
वही उत्पाद का ले लिया जिम्मा है
अब तो लोग बाज़ार में पैदा होते है
यहीं मिलते हैं यहीं खोते हैं
बाज़ार में जगते हैं बाज़ार में सोते हैं
लेनी में हँसते हैं देनी में रोते हैं
उधार में अपनी जिंदगी पिरोते हैं
कर्ज के बीज से खेत बोते है
अपने नीयत में जब हम बाज़ार होते है
जेब के बाहर कितने लाचार होते हैं
बाज़ार ने ऐसा डाका डाला है
घर की तिजोरी खाली है
मुरझाये चेहरों पर
कई ब्राण्डों की लगी होठ -लाली है
उपयोगिता और गुणवत्ता के सवाल पर
एक अजीब सा तर्क और वितर्क है
इसी शौकीनी में फँसा
दरिद्रों का मध्य वर्ग है
बेचने और खरीदने के नरक में
ढूढता अजीब सा स्वर्ग है
अनिल कुमार शर्मा ०५/०४/२०१४/
No comments:
Post a Comment