Tuesday, 1 April 2014

क्लिनिक
क्लिनिक के आगे दो कतार है
एक में बीमार है
दूसरे में एम ०आर ० है
एक दवा खायेगा
दूसरा दवा खपायेगा
और एक स्मार्ट  लड़का है
जो भीतर बाहर आता -जाता है
पैथोलॉजी का रास्ता दिखाता है
बीच में एक डॉक्टर बैठा है
जिसका गला टाई में ऐठा है
जो दिल को दिमाग में जाने से रोकता है
सोफा पर बैठा टेरियर भौकता है
मैं मरीज़ की हैसियत से जाता हूँ
और वहाँ पता हूँ
कंपनी के पैड पर
कंपनी की कलम से
कंपनी की दवा उभरती है
जिससे उन तीनों की हालत सुधरती है
चौथा मैं बीमार हूँ
इस कदर लाचार हूँ
पर्चे की दवा और दुकान
मेरी जेब पर भरी है
यह ऎसी महामारी है
जो इलाज से फैली है
किसी की जेब खाली
तो  किसी की भरी थैली है
 भाई साहेब !
आज यही क्लिनिक की शैली है
अनिल कुमार शर्मा
 
र हूँ

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