Sunday, 28 December 2014

वो उठ कर बैठ गए
मैं बैठ कर खड़ा रहा
सवाल जैसा पड़ा रहा
 वो सिंहासन में जड़े रहे
मैं फूटपाथ में जड़ा रहा
यही कि जिंदगी चलती है
दिल में इतनी मचलती है
हंसी कही आँसुओं में पिघलती है
दर्द आह के साथ निकलती है
सपनों के साथ जलती है
अपने घरों में पराये सपने
या पराये घरों में अपने बनाये सपने
क्यों बुनियाद से टकराते है
रोते हुए मुस्कराते है
फलीभूत कर्मों के फल
कुछ ज्यादा सड़ा कर खाते है
मात्र दुर्गन्ध बनकर रह जाते हैं
अनिल कुमार शर्मा  २९/१२/२०१४

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