Saturday, 10 January 2015

मैं  वही जगह हूँ
जहाँ से तुम जिंदगी की तरह चली गयी
क्योंकि जिंदगी तो  आती-जाती है
जगह अपनी जगह पर रह जाती है
बुनियाद  बन कर पछताती है
यही परम्परा  बतियाती है
किसी उम्मीद में मुरझाती है
समय की नदी में बह जाती है
वही बात फिर यहाँ से होकर
कितनी कितनी दूर निकल जाती है
इसी जगह पर जिंदगी
कही दूर से मुस्कराती है
पुराने ज़ज़्बात में फिर कही से
कोई नयी बात आती है
और कितने फूल खिलते है
कितनी तितलिया मँडराती है
जगह की साँस में चलती हवाएँ
ज़िन्दगी की गीत गाती है
कुछ उम्मीद सजाती है
यही युगों की थाती है
अनिल कुमार शर्मा
10/01/2015

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