Saturday, 31 January 2015

मेरे भ्रष्टकेतु
तुम्हारे अलग -अलग हेतु
लक्ष्मी बसना सत्ता रसना
आस्तीन के साँप की तरह
रह -रह कर डँसना
पक्ष में बसना
और विपक्ष में भी बसना
तुम तो एक अलग वर्ग हो
उसी में प्रत्यय और उपसर्ग हो
मेरी बात मेरी हलक से निकाल कर
मेरे विस्तार में कहते हो
फिर भी उसी खूँटे में बंधे रहते हो
नरम -नरम घास चरते हो
एक विचित्र संविधान पढ़ते हो
मेरे जनतंत्र के हेतु हो
धन्य भ्रष्टकेतु हो !
अनिल कुमार शर्मा
 ०१/०२/२०१५

No comments:

Post a Comment