Sunday, 3 August 2014

वह मन्त्र मुग्ध सा दिन जीवन का
मित्र जब तुम मिले मुझसे पहली बार
मुझे  लगा पा  गया  विस्तार
अपने स्वत्व के प्रांगण में  
आत्मा में अतिक्रमित कर गया
गोपनीयता के खोल में बंद
संवेदना के   गुह्य  रत्न
खोल दिया विश्वास के  कोषागार में
एक  सुखद संतोष के  आगार में
मित्र वह तुम थे जहाँ मैं विस्तृत हो गया
तुम्हारे अस्तित्व में खो गया
अब तो एक प्राण दो देह है
मेरे और तुम्हारे बीच
नहीं कोई संदेह है
अनिल कुमार शर्मा
03/08/2014






No comments:

Post a Comment