वह मन्त्र मुग्ध सा दिन जीवन का
मित्र जब तुम मिले मुझसे पहली बार
मुझे लगा पा गया विस्तार
अपने स्वत्व के प्रांगण में
आत्मा में अतिक्रमित कर गया
गोपनीयता के खोल में बंद
संवेदना के गुह्य रत्न
खोल दिया विश्वास के कोषागार में
एक सुखद संतोष के आगार में
मित्र वह तुम थे जहाँ मैं विस्तृत हो गया
तुम्हारे अस्तित्व में खो गया
अब तो एक प्राण दो देह है
मेरे और तुम्हारे बीच
नहीं कोई संदेह है
अनिल कुमार शर्मा
03/08/2014
मित्र जब तुम मिले मुझसे पहली बार
मुझे लगा पा गया विस्तार
अपने स्वत्व के प्रांगण में
आत्मा में अतिक्रमित कर गया
गोपनीयता के खोल में बंद
संवेदना के गुह्य रत्न
खोल दिया विश्वास के कोषागार में
एक सुखद संतोष के आगार में
मित्र वह तुम थे जहाँ मैं विस्तृत हो गया
तुम्हारे अस्तित्व में खो गया
अब तो एक प्राण दो देह है
मेरे और तुम्हारे बीच
नहीं कोई संदेह है
अनिल कुमार शर्मा
03/08/2014
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