Friday, 1 August 2014

पांडेपुर के चौराहे वाले प्रेमचंद
क्या लमही छोड़ दिये ?
गबन और गोदान के बीच में
मंगलसूत्र टूट गया
वह कौन है ?
जो धनिया और होरी को लूट गया
गोबर तो मॉल में सड़ रहा है
मातादीन आज भी वही पोथी पढ़ रहा है
सिलिया के चक्कर में पड़ रहा है
मेहता और मालती सरेआम घूम रहे है
चौराहे पर एक दूसरे को चूम रहे हैं
 ओंकारनाथ तुम्हारी बिजली
गरीबो को करेंट मारती  है
अमीरों के आगे दाँत चियारती है
हलकू फांसी के फंदे में झूल रहा है
सोहना  बहुराष्ट्रीय में  फूल रहा है
 पंच में से परमेश्वर गायब है
न्याय में सही गलत सब जायज है
 ईदगाह में चिमटा है
 अब कर्मभूमि में काले खां 
सहमा है सिमटा है
झूरी  के पास न हीरा है न मोती है
इज़्ज़त पर एक फटी धोती है
 नमक का दरोगा
अलोपदीन के पानी में घुल रहा है
सारा वसूल भूल रहा है धनिया और झुनिया रोती है
बूढी काकी भूखे पेट सोती है
भगत की मन्त्र सूखी  घास है
सियासत की रंगभूमि में टूटता
आज भी बेचारा सूरदास है
प्रेमचंद आज भी  वही फ़न है
मरते समाज में   कफ़न है
जान से कीमती आलू है
आज भी वही दास्तान चालू  है
 तुम्हारे   ज़माने के सब सपने
उदारवाद में सड़कर फूल गए
पांडेपुर के चौराहे वाले प्रेमचंद
क्या लमही भूल गए ?
अनिल कुमार शर्मा
31/07/2014

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