Sunday, 17 August 2014

दीवारें  भी कुछ सुनती है
हवाएँ भी कुछ गुनती है
रोज -रोज मधुबन में
कुसुम कौन सी चुनती है
कितने दीपक झंझावातों में
बुझ विलीन हो जाते है
मधु मोहित स्मित कपोल
सुख कर मुरझाते है
यह यातनाएं जीवन की
बद्ध कम्पित मोह पाश में
क्षण भंगुर काया के
विलास आरूढ़ संत्रास में
कुछ मधु पराग जीवन के
संभावित सुख चुनने को
आये है दिनकर के द्वारे
रश्मि प्रभात बुनने को
मेरे सविता प्रकाशपुंज
मुझको आलोकित कर दो
मेरे मन के गहन कोष में
हटा अंध प्रकाशित कर दो |
अनिल कुमार शर्मा
18/08/2014

No comments:

Post a Comment