Thursday, 14 August 2014

मेरे स्वप्नों में पले जय हिन्द
 यथार्थ की पीठिका पर
कितने भिन्न हो ?
आदर्श गर्भ सिंचित
अब विद्रूप विकार में लय हो
मैं  ढूढ़ता   हूँ   इतिहास संचित
बलिदानों का वह राष्ट्रीय चरित्र
जो नेतृत्व के विकार में बह गया
सिर्फ बंजर  प्रतिकार में रह गया 
क्या जय हिन्द  तुम्हारी आत्मा
सिर्फ   विदेशी विनिवेश में सिमटी है
  सरकार किसी अदृश्य के हाथ में
चलती हुई चिमटी है
जनता सहमी है सिमटी है
भूख के दायरे भी  कितने कीमती है
सिकुड़े हुए पेट पर बाजार हावी है
यही बात बड़ी  प्रभावी है
जिसे जो बुरी लगती  थी
उसे बुरा कह कर उससे भी बुरा हो गया
अब वह अच्छा दिन कहाँ खो गया
मेरे जय हिन्द ये बता
अब तुझे क्या हो गया ?
अनिल कुमार शर्मा  14/08/2014

 

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