Thursday, 13 February 2014

माहौल में सनसनी है
हवा चुप है
संदेह के कटघरे खड़े है
सवाल के ऊपर सवाल
प्रश्नचिन्ह भरे रास्ते
जहाँ हर जबाब टूटता है
आदमी आदमी को लूटता है
 किसी का खून कोई  चूसता है
फिर भी आदमी को  आदमी से उम्मीद है
विश्वास के दायरे संदिग्ध है
आम  आदमी के हाथ का कीचड़
 खास आदमी के मुँह पर पर छीटता है
एक उम्मीद उलीचता है
दृस्टि दिशाहीन है
चेहरे बहुत रंगीन है
मामले भी संगीन हैं
पश्चिम पर अंगुली उठाते
वह पूरब खड़ा था
आज पूरब पर अंगुली उठाते
वह पश्चिम खड़ा है
यह बहुरुपिया आदमी से निकलकर
आम आदमी में बड़ा है
नीयत में कुछ सड़ा है
जिसका सनसनी फैलाना ही
एक मात्र हथकड़ा है

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