मेरे शब्द
तुम्हारे शब्दों से
पनाह माँगते हैं
विनम्रता के खोल ओढ़े ये चुभचुभे
कलेजे में जब तीर की तरह चुभते हैं
मैं स्वयं के विस्फोट से आहत हूँ
मेरी आत्मा और मेरी शरीर
धर्म और कर्म में टकराती हैं
मै एक रस चाहता हूँ
ये दूसरा रस बनाती है
मेरी सरल स्वभाव की आत्मा
दूरूह जीवन के खोल में कुनमुनाती है
यह खोल ही पहचान है
इसी में स्वयं को बन्द पाती है
इसे तोड़ते हुए लगता है
जैसे खुद टूट रहा हूँ
स्वयं को स्वयं से लूट रहा हूँ
मेरे परिवेश और' मैं '
अभिन्न दिखते हुए भी कितने भिन्न हैं
भाव प्रसन्न किन्तु तर्क खिन्न है
दरवाजे से घुस कर दीवार से टकराता हूँ
इसी कोठरी में स्वयं को बन्द पाता हूँ
बाहर के शब्द-जाल
भीतर के शब्द को दबाते हैं
मेरी भाषा में बहुत से शब्द
अनकहे रह जाते हैं ।
अनिल कुमार शर्मा
तुम्हारे शब्दों से
पनाह माँगते हैं
विनम्रता के खोल ओढ़े ये चुभचुभे
कलेजे में जब तीर की तरह चुभते हैं
मैं स्वयं के विस्फोट से आहत हूँ
मेरी आत्मा और मेरी शरीर
धर्म और कर्म में टकराती हैं
मै एक रस चाहता हूँ
ये दूसरा रस बनाती है
मेरी सरल स्वभाव की आत्मा
दूरूह जीवन के खोल में कुनमुनाती है
यह खोल ही पहचान है
इसी में स्वयं को बन्द पाती है
इसे तोड़ते हुए लगता है
जैसे खुद टूट रहा हूँ
स्वयं को स्वयं से लूट रहा हूँ
मेरे परिवेश और' मैं '
अभिन्न दिखते हुए भी कितने भिन्न हैं
भाव प्रसन्न किन्तु तर्क खिन्न है
दरवाजे से घुस कर दीवार से टकराता हूँ
इसी कोठरी में स्वयं को बन्द पाता हूँ
बाहर के शब्द-जाल
भीतर के शब्द को दबाते हैं
मेरी भाषा में बहुत से शब्द
अनकहे रह जाते हैं ।
अनिल कुमार शर्मा
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