Wednesday, 26 February 2014

टॉलस्टॉय   के भाई
एक सेमीनार में
हिन्दी के टॉलस्टॉय
और उनके भाई थे
टॉलस्टॉय ने खोमचा लगाया
भाई ने स्वाद हल्दीराम से उम्दा बताया
तुलसी  दास कबाड़ी थे
कबीर उम्दा खांडसारी थे
यही आलोचना है
दूसरी परम्परा को खोजना है
कालीदास की तरह
विशाल बृक्ष की शाखा पर बैठ कर
उसे अपने हिस्से की ओर से काट दो
असली को असली से ही बाँट दो
यही बात है
दूसरी शुरुआत है
परम्परा के खेत में
ऊगी कपास के रेशे से कुर्ता बनाया
उसमे नए ढंग के जेब और बटन लगाया
पहन कर टाँग दिया
उसे ही दूसरी परम्परा का नाम दिया
जिसमें तीन जेब हैं
'सच ' में फरेब है
ऊपर वाली जेब में कलम है
जिसमे न रोशनाई है
मुँह में जम्हाई है
दायें वाली जेब  भरी है
बांये वाली खाली है
जुबान में जुगाली है
ढ़ीली धोती के नीचे जूता
मजबूत पायदान पर टिका है
जहाँ पक्ष में विपक्ष बिका है
कमजोर रोशनी वाली
आँखों के बीच में एक नाक है
जिस पर चश्मा टिका है
चश्मे की नज़र पर
नाक की ऊचाँई  हावी है
यह व्यक्तित्व बड़ा प्रभावी है
इर्द -गिर्द सिंह और पूँछ हैं
जो नामर्द की मूँछ हैं
ये आलोचना तो सात अंधो की जुबानी है
जो एक हाथी के जिस्म की कहानी है
समग्र का खण्डित है
बहुत बड़ा पण्डित है
 अनिल कुमार शर्मा ----ग़ाज़ीपुर

No comments:

Post a Comment