आदमी के भीतर हम आदमी कितने है
समय के चोट खाये मुरझाये फूल जितने है
काँटों के बहार में फँसी ये पँखुरियाँ
घायल बसंत के दर्द भरे घाव कितने है
मुझे हर घड़ी वह आदमी याद आता है
जो सिर्फ़ आदमी ही रह गया
आदमी की देह ओढ़े
तमाम भेड़ियों की कहानी कह गया
मेरी मिट्टी मुझे तुझ पर भरोसा है
वह आदमी जरुर मिलेगा
इस बंजर में कोई फूल खिलेगा ।
समय के चोट खाये मुरझाये फूल जितने है
काँटों के बहार में फँसी ये पँखुरियाँ
घायल बसंत के दर्द भरे घाव कितने है
मुझे हर घड़ी वह आदमी याद आता है
जो सिर्फ़ आदमी ही रह गया
आदमी की देह ओढ़े
तमाम भेड़ियों की कहानी कह गया
मेरी मिट्टी मुझे तुझ पर भरोसा है
वह आदमी जरुर मिलेगा
इस बंजर में कोई फूल खिलेगा ।
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