कुलगीत के मीत
महामना के पावन मन्दिर में ,
चढ़े हुए तुम ज्ञान कुसुम ।
सुरभित होकर फैल रहे हो ,
मधुर मनोहर विकसित तुम ।
शिव -नगरी , काशी की गरिमा ,
सारनाथ के बौद्ध विहारों में ।
दर्शन , कला , ललित विधा से ,
ज्ञान -विज्ञान , संगीत बहारों में ।
स्मित उपवन के दल प्रफुल्लित ,
परिसर में तुम खिले रहो ।
महामना के पावन कुल की ,
स्निग्ध परम्परा बने रहो ।
महाकाय महामना के फैले हम ,
जड़ , तना , कुसुम , पत्ते है ।
विविध सुमन के मकरंद चुने ,
पर एक मधुकोश के छत्ते है ।
सिंघद्वार का तोरण देखकर ,
मुझसे मिलता निष्छल अतीत ।
होता वर्त्तमान छल सा प्रतीत ,
मैं गूँजता मेरे कुलगीत के मीत । ।
------अनिल कुमार शर्मा
महामना के पावन मन्दिर में ,
चढ़े हुए तुम ज्ञान कुसुम ।
सुरभित होकर फैल रहे हो ,
मधुर मनोहर विकसित तुम ।
शिव -नगरी , काशी की गरिमा ,
सारनाथ के बौद्ध विहारों में ।
दर्शन , कला , ललित विधा से ,
ज्ञान -विज्ञान , संगीत बहारों में ।
स्मित उपवन के दल प्रफुल्लित ,
परिसर में तुम खिले रहो ।
महामना के पावन कुल की ,
स्निग्ध परम्परा बने रहो ।
महाकाय महामना के फैले हम ,
जड़ , तना , कुसुम , पत्ते है ।
विविध सुमन के मकरंद चुने ,
पर एक मधुकोश के छत्ते है ।
सिंघद्वार का तोरण देखकर ,
मुझसे मिलता निष्छल अतीत ।
होता वर्त्तमान छल सा प्रतीत ,
मैं गूँजता मेरे कुलगीत के मीत । ।
------अनिल कुमार शर्मा
No comments:
Post a Comment