Wednesday, 15 January 2014

   कुलगीत के मीत
महामना के    पावन    मन्दिर      में ,
चढ़े     हुए     तुम     ज्ञान     कुसुम ।
सुरभित    होकर     फैल     रहे  हो ,
मधुर   मनोहर    विकसित      तुम ।
शिव -नगरी ,  काशी      की  गरिमा ,
सारनाथ   के       बौद्ध      विहारों में ।
दर्शन ,  कला ,   ललित   विधा    से ,
ज्ञान -विज्ञान ,   संगीत    बहारों में ।
स्मित   उपवन   के   दल प्रफुल्लित ,
परिसर      में     तुम    खिले   रहो ।
महामना   के     पावन     कुल   की ,
स्निग्ध       परम्परा      बने  रहो ।
महाकाय  महामना  के  फैले हम ,
जड़ ,   तना ,   कुसुम ,      पत्ते  है ।
विविध   सुमन    के   मकरंद चुने ,
पर    एक   मधुकोश   के   छत्ते है ।
 सिंघद्वार    का    तोरण  देखकर ,
मुझसे मिलता   निष्छल अतीत ।
होता   वर्त्तमान   छल   सा प्रतीत ,
मैं गूँजता मेरे कुलगीत के मीत । ।
  ------अनिल कुमार शर्मा

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