Sunday, 12 January 2014

            मेरी हिन्दी
मेरी हिन्दी में कुछ हिन्दी वाले हैं
जो अपने कद की खड़ी किये दीवालें हैं
हिंदी बह -बह कर रुक जाती है
इन हिंदी वालों के चंगुल में छटपटाती है
मचा हुआ घोर संग्राम है
इधर भी सिकिया पहलवान है
उधर भी सिकिया पहलवान है
आलोचक बूढ़ा लेखक जवान है
मुँह में चबाता बनारसी पान है
चापलूसी की चटनी, पुरस्कारों की पकौड़ी
पुरस्कृत पुस्तकों के पन्नों पर खायी जाती है
हिंदी में यही तरकीब अपनायी जाती है
लेखक पटाखा है लेखिका फूलझड़ी है
हिंदी इन्हीं कर्णधारों के पल्ले पड़ी है
जैसे राजनीति में जात है
वैसे साहित्य में कई पाँत है
जो हिंदी में जन्मजात है
कोई छींकता है तो उसमें हिंदी है
चिल्लाता है गुर्राता है
जगह -जगह से विचार चुराता है
कई जीभों में लपेटकर
मेरी हिंदी में अपना बताता है
क्योंकि हिंदी हिंदी से बाहर नहीं जातीहै
इन्ही बंद कोठरियों में छटपटाती है
जिस पर लटका हुआ बहुत बड़ा ताला है
मेरी हिंदी में विचित्र हिन्दीवाला है
चाभी उसके पास है
उसे इतना विश्वास है
कि हिंदी उसकी है
बजता चुटकी है
आवाज हिंदी हो जाती है
यही लिखी जाती है
यही पढ़ी जाती है
मेरी हिंदी इन्ही दीवारों में गढ़ी जाती है ।
--------अनिल कुमार शर्मा


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