Wednesday, 1 January 2014

मैं मौत को जीतने चला
शरीर को पीटने चला
शरीर के तत्व बिखर गए
आत्मा में निखर गए
एक ज्योति जल गयी
 उसमें शरीर पिघल गयी
देश काल विलीन हो गया
अमरत्व में लीन हो गया
मैं जहाँ हूँ वहाँ नहीं भी हूँ
एहसास होने लगा
उसी प्रकाश में
मेरा अंधकार खोने लगा
प्रभु तुमसे अभिषिक्त हूँ
स्वतः प्रदीप्त हूँ ।

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