Saturday, 7 June 2014

उत्तरआधुनिकता का समर्थक हूँ


मैं भाषा को तोड़ता हूँ
स्वर व्यञ्जन  मोड़ता हूँ
शब्दों में सार्थक कम, ज्यादा निरर्थक हूँ
उत्तर -आधुनिकता का समर्थक हूँ
अंको में बोलता हूँ , शब्दों में तोलता हूँ
संकेतों में इधर -उधर डोलता हूँ
खोखले प्रतीकों पर भुरभुराता बिंब हूँ
पानी के हलचल में हिलता प्रतिबिंब हूँ
साहित्य के कटोरे में , विभ्रम में तराशे हुए
चाँदी के शब्द सोने के भाव भरता हूँ
हक़ीक़त में जस्ते के टूटे बर्तनों में
जिंदगी के घुटते सांसों का हिसाब करता हूँ 
ज़मीं पर होते हुए ज़मीन पर होने में डर लगता है
बहुत दूर का आसमान अपना घर लगता है
पांव कीचड़ में सने है नज़र सितारों की सैर करती  है
अपनी गढ़ी हुई दुनिया इस दुनिया से वैर करती है
अपनी सिमटती जिंदगी अपनों से गैर करती है
भाषा और विभाषा का तर्क मिलाता हूँ
शब्दों को नया अर्थ पिलाता हूँ
पाले गए व्याकरण में विचित्र वाक्य बनाता हूँ
टूटते समाज के शब्दों को जोड़कर
नया सिंटेक्स बनाता हूँ
यह बात कितनी विचित्र लगती है
व्याकरण की भाषा कविता को ठगती है
ठगी हुई कविता आँसू बहा कर फिर से मुस्कुरा रही है
शब्दों के जाल से छनकर भावना बहा रही है
ठोस बर्फ छूने पर पिघल रहा है
कवि का हृदय उबलता वायु निगल रहा है
पिघलते पिघलते बिल्कुल अमूर्त हूँ
अपनी भाषा में स्वतः स्फूर्त हूँ
आदमी के टूटन का घुटन का प्रतिमूर्त हूँ
बाजार के चौराहे पर बैठी कविता
दीदा फाड़कर रो रही है
थकी हुई कलम गहरी नींद में सो रही है
आलोचना थ्योरी में खो रही है
नयी तरह की गोलबंदी हो रही है
कुछ कलम घसीटू रेवड़ी लिख रहे है
चिन्तनशील होने की चिंता में दिख रहे है
प्राचीनता को तोड़ता आधुनिकता
अब उत्तरआधुनिकता में बिखर रहा है
आदमी का नंगापन अब बेहतर निखर रहा है
महसूस होने तक महसूस में सिहर रहा है
सड़े साम्राज्य की कथा में बिहर रहा है
पहचान खो कर पहचान बनाने में परेशान है
"भड़ैती "का सिद्धान्त ढूँढता विद्वान है
टूट कर बिखरा हुआ ,ज़मीन छोड़कर निखरा हुआ
धुंध में ढका हुआ साफ सुथरा आसमान है
उत्तरआधुनिकता की रंगीन गड़ही में नहाकर
तरह तरह का पोशाक पहनता हुआ
कटी जुबान में बिना सिर पैर का इंसान है
महज़ वर्तमान में फिट होने की जिद है
अतीत से भागा हुआ अधर में लटका भविष्य है
चाक पर घूमता है एब्सर्डिटी में झूमता है
फटे होठ का खून चूमता है
हँसने के भ्रम में ज्यादा रो रहा है
लगता है घोड़ा बेचकर सो रहा है
अपनी छोटी पहचान को बड़ी पहचान से धो रहा है
आम उखाड़ कर बबूल बो रहा है
आदमी की समस्या रोबोट के आगे रो रहा है
अब तो आदमी की आदमियत फीकी है
यह तकनीकि सचमुच में तीखी है
अनिल कुमार शर्मा    26/12/2014



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