Sunday, 22 June 2014

यह दौर
और यह सवाल
 दोनों कितने खतरनाक है
सब कुछ सही लगते हुए
आखिर कहाँ इतना गलत हो जाता है
यह देखकर दिमाग चकराता है
सही गलत और गलत सही हो जाता है
कही का सियार कही का बाघ हो जाता है
फटी किताबो में घुन खाए अक्षरों की तरह
कुछ भकड़े हुए ईमानदार लोग
बेईमानी की चिकनी सतहों पर फिसल जाते है
बेईमान ईमानदार कहलाते है
ईमानदार बेईमान हो जाते है
सियासत के रासायनिक परिवर्तन का प्रभाव है
इस दौर का यही गुण -धर्म -स्वभाव है
और तुम सवाल पूछते हो ऐसा क्यों है ?
यह सही है सवाल मुखर है
जबाब मौन है
सवाल यह है कि
इस सवाल के घेरे में कौन है
मैं भी कतराता हूँ
तुम भी कतराते हो
और वह तो और कतराता है
अब इस सवाल का सामना
कोई भी नहीं कर पाता है
समय के कटघरे में
अब ऐसा क्यों है ?
यह सवाल पूछने में डर लगता है
मेरे दोस्त अब ये बता
तुझे यह दौर किस कदर लगता है ?
अनिल कुमार शर्मा


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