यह दौर
और यह सवाल
दोनों कितने खतरनाक है
सब कुछ सही लगते हुए
आखिर कहाँ इतना गलत हो जाता है
यह देखकर दिमाग चकराता है
सही गलत और गलत सही हो जाता है
कही का सियार कही का बाघ हो जाता है
फटी किताबो में घुन खाए अक्षरों की तरह
कुछ भकड़े हुए ईमानदार लोग
बेईमानी की चिकनी सतहों पर फिसल जाते है
बेईमान ईमानदार कहलाते है
ईमानदार बेईमान हो जाते है
सियासत के रासायनिक परिवर्तन का प्रभाव है
इस दौर का यही गुण -धर्म -स्वभाव है
और तुम सवाल पूछते हो ऐसा क्यों है ?
यह सही है सवाल मुखर है
जबाब मौन है
सवाल यह है कि
इस सवाल के घेरे में कौन है
मैं भी कतराता हूँ
तुम भी कतराते हो
और वह तो और कतराता है
अब इस सवाल का सामना
कोई भी नहीं कर पाता है
समय के कटघरे में
अब ऐसा क्यों है ?
यह सवाल पूछने में डर लगता है
मेरे दोस्त अब ये बता
तुझे यह दौर किस कदर लगता है ?
अनिल कुमार शर्मा
और यह सवाल
दोनों कितने खतरनाक है
सब कुछ सही लगते हुए
आखिर कहाँ इतना गलत हो जाता है
यह देखकर दिमाग चकराता है
सही गलत और गलत सही हो जाता है
कही का सियार कही का बाघ हो जाता है
फटी किताबो में घुन खाए अक्षरों की तरह
कुछ भकड़े हुए ईमानदार लोग
बेईमानी की चिकनी सतहों पर फिसल जाते है
बेईमान ईमानदार कहलाते है
ईमानदार बेईमान हो जाते है
सियासत के रासायनिक परिवर्तन का प्रभाव है
इस दौर का यही गुण -धर्म -स्वभाव है
और तुम सवाल पूछते हो ऐसा क्यों है ?
यह सही है सवाल मुखर है
जबाब मौन है
सवाल यह है कि
इस सवाल के घेरे में कौन है
मैं भी कतराता हूँ
तुम भी कतराते हो
और वह तो और कतराता है
अब इस सवाल का सामना
कोई भी नहीं कर पाता है
समय के कटघरे में
अब ऐसा क्यों है ?
यह सवाल पूछने में डर लगता है
मेरे दोस्त अब ये बता
तुझे यह दौर किस कदर लगता है ?
अनिल कुमार शर्मा
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