Wednesday, 4 June 2014

मेरे जहरीले शहर !
पूछते हो क्या हुआ है
जहाँ सुबह भी धुवां है
शाम भी धुवां है
जमीं पर जिनके पैर नहीं है
उनके गाड़ी के पीछे धुवां है
अब तो एक घर के जगह पर तीस घर  है
फिर भी आदमी बेघर है
गलियों में तमाम ब्रांडों के पॉलीथीन पटे है
संकरी जगह में घरों से घर सटे है
किन्तु आदमी आदमी से  कटे है
हम आधुनिक लोग तो
अपने कद से कुछ ज्यादा घटे है
चमकते जूतों के तलवे फटे है
क्यों हम अपनी जमीन से इतने कटे है
चहारदीवारी के बहार अविश्वास खड़ा है
गलियों में एक अजीब खौफ पड़ा है
हर जगह लगता है कुछ सड़ा है
साज़िशों की बदबू से दिमाग भरा है
क्यों इतना गुनाह हर जगह है
इसका गुनहगार कौन है
इस सवाल पर मेरे शहर !
क्यों इतना तू मौन है ?
अनिल कुमार शर्मा  ०४ /०६/२०१४

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