Sunday, 1 June 2014

सुनो किसानों
सुनो किसानों ! कृषि प्रधान देश के कर्णधारों !
तुम्हारे खेत को कबूतर चुग गया
नयी रोशनी का सूरज उग गया
सड़ी रोशनियों वाली खिड़कियाँ बंद करो
और अँधेरा हो जाने दो
पुरानी रोशनी को एकदम खो जाने दो
नयी रस्सियों में अपने हाथ -पाँव  बाँधकर
उसका छोर मुझे दे दो
जिसमे गाँठ लगा सँकू
और उसे पेटेंट करा सँकू
गाँठ लगाने की तकनीक मेरी है
जिसमे कि तुम बँधे हो
तुम्हारे खेतों में उगे अनाज
मेरी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी है
तुम्हारे पास सिर्फ तुम्हारी मेहनत
और तुम्हारे खेत की ऊसर मिट्टी है
नियम यह है कि बादल मैं बनाऊंगा
बरसात से तुझे बरकना होगा
तुम्हारे खेत में मेरे ही ट्रैक्टर चलेंगे
मेरा ही बीज और खाद छिड़कना होगा
तुझे फसल चरते भैंसे को रोकना होगा
मेढ़ को हर तरफ से तोपना होगा
तुम अपने ही खेत में बिजूके हो
पेट के सवाल पर क़र्ज़ के ब्याज में डूबे हो
चिथड़ों की गर्दिशे तुम्हे लुभाती है
पैदवार के नाम पर ----
सटे खेत का मेढ़ खुदवाती है
तुम्हारे खेत में खुले सांड़ है
घरों में पंचायत है
विकास होते हवा की यही इनायत है
बगल में ताड़ी खाना है
उससे सटा थाना है
तहसील है कचहरी है
पसीने से भींगते तन की आग हरी है
सड़ी जुबान में खोटी है खरी है
बस बात इतनी है कि
खेत में घुस गयी कोई बकरी है
तुम्ही गवाह और साबुत हो
निहायत गफलत इतनी ही
कि तुम मजदूर और किसान हो
 किसी जातिगत   ढांचे के बिधान हो
मेढ़ खोदकर मेढ़ बनाने में परेशान हो
जय मजदूर ! जय किसान हो!
अनिल कुमार शर्मा   ०१ /०६ /२०१४
( कंगाल होता जनतंत्र से पेज -105 )

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