विसर्जित आदर्शो से प्रदूषित नदी
परम्पराओं की नेकी- बदी
खुलती ढोल की पोल है
इतिहास से भागा हुआ
एक विचित्र भूगोल है
अब ज़मीन को आसमान से देखते है
अजीब आंकड़े फेकते है
यह तो नया परिवेश है
सिर्फ निवेश है निवेश है
सिर्फ बेचो खरीदो का सन्देश
इसी रास्ते पर अपना देश है
पानी बोतल में है
जमीन होटल में है
जिंदगी मॉल में है
जो बची -खुची है
मौत के जाल में है
बहुधन्धी कारोबार है
विचित्र रोजगार है
बूढ़ा बेकार है
पाता पगार है
युवा बेरोजगार है
अपनी सरकार है
शिक्षा संविदा पर है
विभाग खाली है
देश में एक खाई है
बहती जिसमे नाली है
सपने दिखने के बाद भी
अभी सपनों की जगह खाली है
अनिल कुमार शर्मा ०३/११/२०१४
परम्पराओं की नेकी- बदी
खुलती ढोल की पोल है
इतिहास से भागा हुआ
एक विचित्र भूगोल है
अब ज़मीन को आसमान से देखते है
अजीब आंकड़े फेकते है
यह तो नया परिवेश है
सिर्फ निवेश है निवेश है
सिर्फ बेचो खरीदो का सन्देश
इसी रास्ते पर अपना देश है
पानी बोतल में है
जमीन होटल में है
जिंदगी मॉल में है
जो बची -खुची है
मौत के जाल में है
बहुधन्धी कारोबार है
विचित्र रोजगार है
बूढ़ा बेकार है
पाता पगार है
युवा बेरोजगार है
अपनी सरकार है
शिक्षा संविदा पर है
विभाग खाली है
देश में एक खाई है
बहती जिसमे नाली है
सपने दिखने के बाद भी
अभी सपनों की जगह खाली है
अनिल कुमार शर्मा ०३/११/२०१४
No comments:
Post a Comment