Sunday, 26 October 2014

कटोरे में खड़ी जनता
कटोरे में से कटोरा चुनती है
चुना हुआ कटोरा घूमता है
निवेश के चकाचौंध धुप में
सपनों को भूनता है
नफा नुकसान गुनता है
हरे खेत को बंजर बना दो
फिर किसी कंपनी को थमा दो
व्यापार ही  विकास है
प्रगति का आत्मप्रकाश है
राष्ट्रीय बहुराष्ट्रीय में बिक रहा है
कंपनी के प्रचार से
अंतर्निहित भ्रष्टाचार से
भिखमंगे की कटोरे वाली जनता में
यह कटोरा टिक रहा है
रेशमी लिबाश में दिख रहा है
बात बनाता है बात पकाता है 
निवेश का आयातित नमक मिलाकर
बात के भूखे लोंगो  बात खिलाता है
बात के दो घूंट पिलाता है
बात बड़ी यह है कि
वह अपनी बात जिलाता है
अनिल कुमार शर्मा ७२/१०/२०१४



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