Saturday, 31 December 2016

एक झूठ को सच की तरह जी रहा हूँ
आग को पानी की तरह पी रहा हूँ
जलते हुए लोगों से जो बच गया
वह मैं हूँ आदमी के शक्ल में
आज के आदमी के काबिल नहीं
किसी मूल्य के जीवाश्म सा
संग्रहालयों में चमकता हुआ
वर्तमान में अतीत की तरह
स्वयं में व्यतीत की तरह
खुद की उम्र से घायल हूँ
किसी  वृद्ध  नर्तकी का पायल हूँ
अपने वजूद का कमजोर पक्ष
खूनी हवाओं से बचाते हुए
जिक्र में बेहद नरम हूँ
मिज़ाज़ में गरम हूँ
 अनसुलझा भरम हूँ
अनिल कुमार शर्मा
31/12/2016

Wednesday, 14 December 2016

मैं तो  अँधेरे में जी रहा था
टिमटिमाती ढिबरी के सहारे
उसने मेरी झोपड़ी में
आग लगाकर रोशनी कर दी
अब मैं बेसहारा बन कर
इस रोशनी में जल रहा हूँ
नमक की हाड़ी की तरह
जाड़े में  गल रहा हूँ
जौ तो साबुत बचे हुए हैं
जो घुन है पिस रहे है
 यह जो डिजिटल चक्की है
कोई  साज़िश पक्की है
दिवंगत होती मुद्राओं के श्राद्ध में
कितने कतारों में दिवंगत हुए
प्रश्न की परिधि में पूँजी की चाल है
देश में   बिछायी गयी कोई जाल है
मैं स्वयं की परिधि से वंचित हूँ
हवा पीते हुए भूख में संचित हूँ
मेरी लक्ष्मी अनर्थव्यवस्था में बंद है
व्यवस्था से आती कोई दुर्गन्ध है
खाता -बही में  तो समृद्ध हूँ
हक़ीक़त में  कंगाल हूँ
मुफ़लिसी में नोचता बाल हूँ
अनर्थशास्त्रियों के ज्ञान से
हो गया ख़स्ता -हाल हूँ
वित्त वंचित इंसान हूँ ।
अनिल कुमार शर्मा
14/12/2016






Tuesday, 6 December 2016

घड़ियाल भी आँसू बहाता है
नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज़ जाती है
 जिसकी लाठी उसकी भैंस कहलाती है
आस्तीन का साँप भी होता है
और कौआ कान ले जाता है
मुख में राम बगल में छूड़ी
चांस मिले तो काटे मूड़ी
बकरे की माँ कब तक  खैर मनायेगी
वह घड़ी कभी तो आएगी
हंस चुगेगा दाना - पानी
कौआ मोती खायेगा
यह सब अपने ही देश में होता है
जिस थाली में खाता है
उसी में छेद करता है
एक शुद्ध मूर्ख भी  बात करता है
 बिके हुए ज़मीर को तो
हर  हक़ीक़त रंगीन दिखती है
क्या करें जिन्दा लाश चीखती है
कतारों में लगी अपनी रूह दिखती है
अब तो सफ़ेद चीज भी काली दिखती है
गंगाजी भी नाली दिखती है
तिजोरी तो भर गयी
अपनी जेब ख़ाली दिखती है
अनिल कुमार शर्मा
 06/12/2016



Friday, 25 November 2016

विवेकी राय को श्रद्धांजलि 
सोनामाटी के मनबोध मास्टर !
क्या लोकऋण चुका दिए ?
दिवंगत युग की स्मृतियों के स्वेदपत्र
नयी कोयल की जीवन परिधि में
गूँगा जहाज जैसे जीवन का अज्ञात गणित है
कालातीत होकर अभी समर शेष है
वन तुलसी की गंध अवशेष है 
देहरी के पार अब जुलूस रूका है
गंवई गंध गुलाब से गुजरते हुए
पुरूषपुराण क्यों बबूल के पक्ष में झुका है
चित्रकूट के घाट पर आम रास्ता नहीं है
 लोक जीवन की तुझ जैसी कोई और दास्ताँ नहीं है
भाषा के अहरे पर फुटेहरी जैसी सिंकी हुई
कई विधाओ की ज्योनार तुम्हारे सिवान में मिल जाती है
 चली फगुनहट बौरे आम तबियत खिल जाती है
अंचल को ही अपना जगत तपोवन सो कियो
टुकरा मिले बहुरिया घाट घाट का पानी पियो
रात के सन्नाटे बेकार दिनों के उजास
रचना में लोकभाषा की पनही पहनकर चलते हैं
तत्सम तद्भव मिलकर भदेस से कुछ कहते हैं
 समझ का प्रयोग कर  भी फिर बैतलवा डाल पर रहते हैं
नमामि ग्रामम के लोग भी बेटे  बिक्री करते हैं
ऊसर के रेह में सौन्दर्य तलाशते हुए
 पगडण्डी  की भाषा को सड़क से बचाते हुए
कोई नया गाँवनामा  रच  रहे थे
उम्र की दहलीज पर थके ह्रदय से
पुत्रशोक में  टूटे हुए आदमी से हटकर
 जीवन और प्राण के अंतराल में
अक्षुण यशो राशि पर आरूढ़
रचना पथ के अविराम पथिक
नवोदित लेखको की करते नेकी
श्रद्धांजलि है तुझे राय विवेकी ।
अनिल कुमार शर्मा
२५/११/२०१६








Thursday, 24 November 2016

                                                             

                                                                    कविता में जनतंत्र 
                                                                                                             डॉ ०  वेद प्रकाश अमिताभ 
                                                                                      हिंदी विभाग , अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय 
        समकालीनता की प्रमुखता  उसमें  निहित व्यवस्था -विरोध की हिम्मत है । अनेक रचनाओं के शीर्षक गवाह हैं कि समकालीन सर्जक  मौजूदा जनतांत्रिक व्यवस्था में जनाकांक्षाओं के हनन को लेकर चिंतित रहे हैं। ठिठुरता हुआ गणतंत्र (हरिशंकर परसाई ), ' डेमोक्रेसी के भगवान '(यज्ञ शर्मा ),'मन चलता है लोकतंत्र में '(गोपाल बाबू शर्मा ),'  गणतंत्र सिसक रहा है '(सुधीर ओखदे ) आदि की ही श्रृंख़ला में ही अनिल कुमार शर्मा का कविता -संग्रह- ' कंगाल होता जनतंत्र ' भी उल्लेखनीय है । इस संग्रह में श्री शर्मा एक समय-सजग  कवि के रूप में प्रभावित करते है । जनता के द्वारा जनता के लिए निर्मित हर तंत्र में सामान्यजन की दुर्गति सर्वाधिक द्रष्ट्रव्य है । कवि ने मजदूरों -किसानों , वंचितों ,उत्पीड़ितों के दुःख -दर्द पर बराबर दृष्टि केंद्रित रखी है । 'मजदूर किसान बेहद लाचार है ', जी तोड़ मेहनत के बाद भी जिनके पेट रह जाते है खाली ', पेट के सवाल पर क़र्ज़  ब्याज में डूबे हो ' आदि  से कवि की यथार्थ चेतना और पक्षधरता स्पष्ट है । कोढ़ में खाज़ यह है कि नई उदार नीति और भूमंडलीकरण से उपजे बाज़ारवाद ने भी श्रमजीवियों को ही छला है । इसलिए संग्रह की शीर्षक  कविता में जिस निष्कर्ष पर कवि पहुँचता है , वह यथार्थ से पुष्ट है - 'विदेशी पूंजी से छलकते हुए समृद्धि की हवाओं से कंगाल होता जनतंत्र हूँ '। 'जिसने लोकतंत्र कमा लिया ' कविता में मूल्यहीन अर्थव्यवस्था से पोषित लोकतंत्र की विडम्बना इन शब्दों में उजागर हुई है - ' यह लोकतंत्र एक खिलौने की दुकान है /  जहाँ जगह की सहूलियत के लिए बाघ की पीठ पर बकरी रख दी जाती है /'। कवि को प्रतिवाद और प्रातिरोध के स्वर भी सुनाई देते है , लेकिन वे सबल और कारगर नहीं हैं ।
          अपनी जनधर्मी और समाजबोधी अंर्तवस्तु को संप्रेषणीय बनाने के लिए शर्मा ने जो भाषा चुनी और बुनी है ,  वह यथार्थपरक और प्रभावोत्पादक है , उनके काव्य -बिम्ब ,संवेदना और विचार को उभारने में सर्वथा सक्षम हैं । 'भिखमंगे के कटोरे ','आशा की खूँटी ', 'आस्था की सफेदी ','ग्लोबलिज़शन की थाली ', ' तेजाब का काजल ', 'आधुनिकता की पटरी ' आदि विडम्बनाओं - कुरूपताओं की तीक्ष्ण अभिव्यक्ति में सफल है । यथार्थ में गहरे धँसी और छटपटाती इन कविताओ से गुजरना विचारोत्तेजक अनुभव है ।                                                                                                          ( गाज़ीपुर समाचार :१६ नवम्बर २०१५ से २२ नवम्बर से साभार )


Saturday, 19 November 2016

एक देश में कई देश देखा
लाइन में खड़ा दरवेश देखा
जड़ खोदकर फल इतरा रहा है
किसकी ज़मीन खा रहा है
भस्मासुर गा रहा है
गंगाजल बेचकर
नमामि गंगे गा रहा है
लक्ष्मी के दरबार में
श्रीहीनता का दौर है
दिवंगत धन के बोझ से
निजात पा कर पेट खाली है
दुरभिसंधि की जुगाली है
देश में खड़ी भूखी भीड़ को
कोई अजूबा देश दिखा रहा है
वह तो देश के लिए ही
पोशाक बदलते हुए जी रहा है
हमें देश के लिए दरिद्र हो कर
लाइन में मरना सिखा रहा है
उसकी हर बात में अपना देश आता है
आंख में धूल झोंककर
कोई अजीब विकास दिखाता  है
अपनी अपनी डफली
अपना अपना राग बजाता है
अनिल कुमार शर्मा
१९/११ /२०१६


Wednesday, 9 November 2016

लाल बुझक्कड़ की सरकार में
सनसनी ही सनसनी हो रही है
जनता में जनता का ही हिस्सा है
और उस हिस्से का कोई किस्सा है
बासी अख़बारों की तरह योजनाएँ
रोज काले चश्मों से पढ़ी जाती हैं
समाधान भी विचित्र गढ़ी जाती है
पेट की आग पर पूंजी पक रही है
बटलोई में कोई राज ढक रही है
जो तिजोरी में बंद है वह सफ़ेद है
जेब से जो बच गया वह  काला है
उसी पर तो चल रहा बर्छी भाला है
नज़र में अब तो बेचारी लहरें है
गहरे समंदरों पनडुब्बियां सुरक्षित है
झोपड़ियों के उड़ाने के विधान में
हवेलियाँ तो सदा संरक्षित हैं
बिकी हुई सहानुभूतियों को पढ़ते हुए
न बिकने वाला एक दर्द उभर आता है
रंगीन रोशनी में  कुछ यूं ही छटपटाता है
विशुद्ध रोशनी की तलाश में गुम हो जाता है
अब ज़मीनी हक़ीक़त कहाँ खो रही है
लाल बुझक्कड़ की सरकार में
सनसनी ही सनसनी हो रही है ।
अनिल कुमार शर्मा
09/11/2016



Tuesday, 8 November 2016

 वह यही था सच जो
युगों के ज्ञान के इलाके में
बुद्धि के उबड़ -खाबड़ पगडंडियो पर
चलता हुआ अँधेरे से उजाले की ओर
और वह उजाला भी युगान्त के बाद
बने मठों के अँधेरे में ढलता गया
जैसे तेज आँखों में मोतियाबिन्द हो गया हो
खुद के परदे में  समूचा दृश्य खो  गया हो
पर्दा हिलता है  तो लगता है संस्कृति हिल रही है
बनायी हुई शुद्धता में कोई अशुद्धि मिल रही है
 यही घोंघे की घोंघे में स्वघोषित क्रान्ति है
विचित्र ज्ञान के चमक की भ्रान्ति है
प्रकृति के विरोध में  उगी पवित्रता की धुंध में
ज्ञान और विज्ञानं के  निर्बाध अन्धाधुन्ध में
बाजार बनते धर्म और विज्ञानं की उपलब्धियाँ
मानव के उपभोक्ता होने तक सिमित है
विज्ञापनों में अवतार उत्पादों पर चिपके है
गुरूजी भी विचित्र संदिग्धता में लिपटे हैं
आस्था और बाजार का घाल मेल है
महर्षि भी बेचता कडुवा तेल है
हे भगवान यह कैसा खेल है ।
अनिल कुमार शर्मा
08/11/2016







Sunday, 9 October 2016

वो तो देश के लिए जान देते है
और देश के लिए जान लेते है 
ये तो देश के जांबाज बेटे हैं 
देश के कोने से कोई पूछता है 
लिए गए और दिए गए 
जानों की गिनती 
तो गज़ब का देशद्रोह है 
देश के भीतर कोई खोह है 
जिससे देश वालों को खतरा है 
कितना अविश्वास पसरा है ?
घोसले में से निकलकर परिंदा 
ठूँठ पर बैठा है 
किसी विरासत पर ऐंठा है 
अब तो ख़बरों में बजती हुई तालियां
गिनी जाती है
गरीबो की थालियां छीनी जाती है
अब जनता अशक्त है
क्योकि देश में स्वघोषित
देशभक्त हैं ।
अनिल कुमार शर्मा
१०/१०/२०१६ 

Friday, 23 September 2016

जब भी मेरा भारत महान होता है
मेरा दिल सारे जहाँ से अच्छा
हिन्दोस्तां होने को बेताब होता है
घूसखोर हाथों से जब तिरंगा फहरता है
मेरा दिल क्यों इतना कहरता है
बापू तुम तो भ्रष्ट ऑफिसों  में टंगे हो
घुस के लिफाफे में लाखों करोङो में बंधे हो
तुम्हारे आज़ाद बन्दर न बुरा देखते हैं
न बुरा सुनते है न ही बुरा कहते है
सिर्फ कुछ कुछ बुरा करते है
क्योकि बंदरों को बुरा करने से
आपने मना नहीं किया था
सरकार के तीनो बन्दर जब
जम्बू दीप के आर्यावर्त के
भारतभूमि खंड में उछलते है
इंसानियत को जब कुचलते है
मुझे तुम्हारी अहिंसा याद आती है
इन बंदरों  सारी हिंसा भूल जाती है
विधायिका  के बन्दर बुरा नहीं कहते
न्यायपालिका के बन्दर बुरा नहीं सुनते
कार्यपालिका के बन्दर बुरा नहीं देखते
क्योकि अपना भारत शुरू से महान है
विश्वगुरु का लिया  हुआ ज्ञान है
यही तो नए विकास का विज्ञानं है
यहाँ किस अँधेरे का भान होता है
जब भी मेरा भारत महान होता है
मेरा दिल  सारे जहाँ से अच्छा
हिन्दोस्तां होने को बेताब होता है
अनिल कुमार शर्मा
२३/०९/२०१६



Wednesday, 14 September 2016

आज तो सब कुछ हिन्दीमय लग रहा है
यह कातिलाना अंदाज़ किसको ठग रहा है
लगता है कोई अधूरा स्वप्न जग रहा है
क्या सूखे फूल पर तितली मँड़राती है ?
किस अँधेरे में यह कोयल गाती है
अब तो दिया अलग है अलग बाती  है
यह जो जुगाड़ू हिंदीवालों  की थाती है
अंग्रेजी पीती है और अंग्रेजी खाती है
देशी को हिंदीबाज़ी  से फुसलाती है
स्वघोषित मूर्धन्यों की कलाबाज़ी है
परम्परा में छेद खोजता प्रगतिवादी है
टूटे तेवर में कितना उछल रहा है
अपना देश कितना फुसल रहा है
भाषाओँ के ढेर में विविध अंदाज़ हैं
कोलाहल करते कितने ही साज़ है
भाषा है और कितनी ही विभाषा है
राष्ट्र तुम्हारे आवाज़ की क्या परिभाषा है ?
तुम तो कई भाषाओँ में बोलते हो
कितनों का गुप्त राज खोलते हो
तुम तो अनेक रहते हुए में एक हो
भाषा के मामले में भी प्रत्येक हो
कदम कदम पर ले रहे टेक हो
इसी में यह हिंदी आ जाती है
टिटिहिरी की तरह टर्राती है
हिन्दीवाले भी बूझते है
अहिन्दी वाले भी बूझते है
विचित्र बात पर जूझते है
गाते बजाते एक संग्राम है
यही हिंदी दिवस का प्रोग्राम है
भाई साहब आज हिंदी में सलाम है ।
अनिल कुमार शर्मा
१४/०९/२०१६









Sunday, 11 September 2016

उसकी सूरत कविता की झरबेरी में
लिपटी हुई  हिंदी की तरह है
मुँह में करैली जैसी आलोचना है
हाथ में कलम के बजाय कोंचना है
सौंदर्य में कृत्रिम भाषा बिलोरना है
वह तो एकांकी में  चिल्लाता है
रेखा चित्र में दाल भात खाता है
जुगाड़ी पत्रिकाओं के कालम में
दिन में उल्लू की तरह इतराता है
निराला का  चाचा मुक्तिबोध का
 कुछ और रिस्ते में खुद को पाता है
इस धुंध में बेहद प्रगतिशील है
खाली आसमान में उड़ता चील है
पुरस्कार पर झपट्टा मारता है
नियत में कुछ ज्यादा  रंगीन है
यह आदमी बड़ा संगीन है
अनिल कुमार शर्मा
११/०९/२०१६



Tuesday, 6 September 2016

का हो गुरु !
ब्रह्मा हो विष्णु हो महेश हो
चेला के आगे गोबर गनेश हो
अब तो चेला स्कूल चलाता  है
गुरूजी को वित्तविहीन कॉलेज में
पलिहर का  बन्दर का बनाता  है
खाली टिन की तरह बजाता है
चेला जब  चुनाव लड़ता है
गुरूजी पोस्टर चिपकाते है
दारू की पेटी भी छुपाते है
घटिया को बेहतर बताते है
अँधेरे में और अँधेरा दिखाते है
एक प्रशस्त कुमार्ग बनाते है
 चाणक्य के चाचा जनाते है
एकलव्य का अंगूठा मंगाते है
 आरुणि उपमन्यु और वेद से
गृहस्ती की मवेशी चरवाते है
विश्वामित्र की तरह जिद में
त्रिशंकू की दुर्दशा कराते है
कुछ तो चेला को फँसाकर
अपनी लंगोट बचाकर खुद पराते है
गुरु से हटकर गुरुघंटाल हो
परम ब्रह्म से  भरमजाल हो
सियार की तरह बाघ की ओढ़े खाल हो
जय जय गुरुघंटाल हो ।
अनिल कुमार शर्मा
05/09/2016











Sunday, 4 September 2016

इस जगत मिथ्या में
ब्रह्म सत्य की तलाश है
ज्ञान बुद्धि सब खलास है
छाया को छाया से काटता हूँ
माया में माया से भागता हूँ
एक नींद से दूसरी नींद में जागता  हूँ
मृगतृष्णा के पीछे  भागता हूँ
किसी  सत्य के कोने में झाँकता हूँ
सद्गुरु की चरणधूलि चाटता हूँ
शरीर के भीतर आत्मा है
और देखता हूँ
उस आत्मा का खात्मा  है
गज़ब का परमात्मा है
कई दुकानों में सजता है
तमाम भाषाओ में बजता है
हर जगह वही लगता है
मायाजाल के   भीतर और
इन संकल्पनाओं  के बाहर 
फिर वही दुनिया है
मुन्ना है और मुनिया है
विचित्र मायाजाल है
एक तुरुप चाल है
ज्योति जलती है
फिर बुझती है
अंधेरों की तरकीब सूझती है
समझते रहो समझाते रहो
सिद्धान्तों में उलझाते रहो
वह तो स्वघोषित सच्चे आदमी की तरह
सतरंगा झूठ बोलता है
अतिन्द्रिय बाज़ीगरी की दुकान खोलता है
आत्मा परमात्मा को तोलता है
ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या बोलता है
अनिल कुमार शर्मा
04/09/2016



Monday, 29 August 2016


इतना सब  कुछ होने के बाद भी
वह नहीं हुआ जो होना चाहिए था
 रोनी सूरत तो वही है
हँसी  न जाने कहाँ गायब है
उस अभियान में
चरखे की लय पर
झोपड़ी   भी गाती थी
हवेली भी गुनगुनाती थी
बनती हुई नयी सड़क पर
कोई खूबसूरत सपने बिछाती थी
वे देखे गए सुनहले सपने
सपने में भी सबके अपने थे
अब तो अपनों में भी
परायों जैसी तासीर मिलती है
लगता है जैसे कोई नींव हिलती है
यह इमारत बुलंद है
बस रोशनी ही मंद है
मीरज़ाफर और जयचंद हैं
खेत खलिहान को बंजर बना दो
नदी नालों को सूखा दो
कायनात को   विकास की भेंट चढ़ा दो
बरगद की जगह दुकाने लगेगीं
आदमी की बनायीं हुई दुनिया
अब आदमी को ही ठगेगी
अब तो चिड़ियाघरों की तरह नुमाइसों में
खुद से निकल कर खुद को  देखते है
माल निचोड़कर सपने फेंकते हैं
खुली आँखों में रंगीन धूल झोंकते हैं
ख़ालिस नयी सड़क बन रही है
हमारे तरफ की गलियाँ बन्द हैं
एक जादू में हम नज़रबन्द हैं
ये  तमाशे किसको कितने फायदेमंद हैं ?
अनिल कुमार शर्मा
29/08/2016



Friday, 26 August 2016

I am  fall of  the fate
Dropped in the gate of hate
Yet this looks so nice
Full of much dark vice
Weeping men and laughing demons
All they look like human
Chains and channels of thoughts
Reality is worst than ought
Such is the spread of knowledge
Poor thought and grand living
Acceptance of all with little giving
They are preaching day and night
And cheating with puzzled light
This is the shown path of the world
You can never divert from the herd
Thought and deed are far apart
Put the cart before the horse
This is the beginning of the order
Something may be found in this disorder
Anil Kumar Sharma
26/08/2016





Thursday, 25 August 2016

विषमकालीन कविता
मेरे समकालीन कवियों !
अब तो शब्दों  की प्रतीति में
अर्थ बिलकुल विलुप्त हैं
ध्वनि के सामानांतर
एक अजीब सी कोलाहल है
समुद्र मंथन का पसरा हलाहल है
अमृत की तलाश में  विष मिला है
जिससे  समय और सन्दर्भ हिला है
विज्ञानं के भरोसे का  जहर और
अध्यात्म के अखाड़े का कहर
बताओ तो किस पर टूटता है
इसमें किसका दम घुटता है
समकालीन दिशा में विषम हूँ
भाषा के शब्दजाल का वहम हूँ
भीतर की सड़ाध बाहर महकती है
रंग और इत्र पोतकर गमकती है
लिंगप्रबुद्ध आलोचक मदनमय होकर
योनिपूजन के अनुष्ठान गढ़ते है
दरिद्र व्यवस्था में प्रतिष्ठान बनते है
भाषा में  अजीब साहित्यगिरी  करते  है
अब तो कविता से ज्यादा कविताबाज़ी है
 प्रतिष्ठानों  में घुरहू कतवारू पड़े हुए है
सौंदर्यहीन हीरे मोती में जड़े  हुए हैं
इस माहौल में मेरी कविता शरमाती है
दिमाग में घुसकर गरमाती है
समय और सन्दर्भ को गाती है
जो एक आग का खेल है
खाली दिया में तेल है
जिसमे लौ बनकर जलना है
समय के आँच में पिघलना है
ज्ञान से आच्छादित विचित्र तम है
सौन्दर्य के समवाय में विषम है
नूतन प्रकाश ढूँढ़ती सविता है
मित्र यह विषमकालीन कविता है ।
अनिल कुमार शर्मा
25/08/2016












Monday, 22 August 2016

अब तो सवालों में ढक गया हूँ
किसी अँधेरी नियति की तरह
ये उजाले की तरह सवाल सारे
किसी घुप अँधेरे में टकराते है
खुद को कहाँ हम पाते है ?
वे तो जबाब की तलाश में
सवालों पर पटक जाते हैं
जो भी जबाब बनता है
उसे  भी गटक जाते हैं
मैं तो स्वर्ग के रास्ते में
त्रिशंकू की तरह लटका हूँ
विश्वामित्र से पाया झटका हूँ
इन्द्र की नीयत में खोट है
दिल में स्वर्ग की चोट है
लगता है नरक का भरोसा है
क्यों भाग्य को इतना कोसा है
ये लोग तो अब जिंदगी छीनते  है
हमें कई गुणांकों में गिनते हैं
उनसे हमारी बिनती है
और हम उनके लिए मात्र गिनती हैं
उलझे सवालों की तरह
ये जबाब भी उलझे हैं
राख़ से  अलाव बुझे हैं
अनिल कुमार शर्मा
२२/०८/२०१६

Thursday, 18 August 2016

In the bed of time
I feel a strange rhyme
Words differ to the language
I feel a little assuage
Created God and for granted Devil
Hammer of faith on the human anvil
Swings between hell and heaven
Light is rampant where I go
In the cover of mysterious dark
There is a suspicious torch
Where dark is defined as light
Peace is achieved with fierce fight
Ruined nature with rich culture
This man is worst than vulture
It is praise of  the dead life
Hope and dream are major rife
This prosperity is full of dearth
This void land is devoid of earth
Steps are hanging without any ground
All are lost in this liberal found
Run with the hare and hunt with the hound
This situation seems so sound.
We all lost in this technique of mime
In the bed of time
I feel a strange rhyme.
Anil Kumar Sharma
18/08/2016








Wednesday, 17 August 2016

You are so fresh like good morning
You are so hot like good noon
Each day and every hour
Nicely felt and lovely empowered
So faithful like afternoons
In the timeless stream of times
Lovely colours of day and nights
In the breath of lovely moments
You are tasty like good evening
You are comfort of sunset
And hope of the sunrise
You are whiteness of limitlessness
And sphere of running redness
You are fulfilled with delight
You are so sweet like good night
Anil Kumar Sharma
17/08/2016





Tuesday, 16 August 2016

मित्र जो देखते हो
उसे उसी तरह कह दो
नमक -मिर्च की जरुरत भी नहीं है
वह जंगली फूल की तरह खिलेगा
किसी घाव को छिलेगा
इंद्रधनुष के रंग में बिखरी हुई छटा
दुर्भाग्य की घिरती हुई काली घटा
कनफटा नकफटा मुंहफटा
सब छू मंतर हो जाएंगे
जब स्थिति को हम समझ पाएंगे
इस भाषा की व्यवस्था में
जो कहने की आदत है
सूखे शब्दों से बने उलझे वाक्य
संज्ञा सर्वनाम विशेषण की   परिधि में
क्रिया के बाद प्रतिक्रिया की भी गुंजाइश है
एक भाषाई नुमाइश  है
देरिदा तुम्हारी क्या फरमाइश है
शब्दों की  पकड़ से छूटते हुए अर्थ
क्या गढ़ पाएंगे नए शब्दो को
क्या प्रतिष्ठा मिल पायेगी उन
उपेक्षित तिरष्कृत दलित अपशब्दों को ?
महाआख्यान की वेदी पर
निर्बलों  की दी गयी बलि
क्या मरी हुई जिंदगी में
नयी शक्ति का संचार कर पायेगी ?
कुछ टूटे पड़े वाक्य  अभी बाकी हैं
यह रिक्त स्थानों की उलझी झाँकी  है
अब तो  मैं  रोशनी में से रोशनी छाँटता  हूँ
तमाम बंधनों को काटता हूँ
लगता है कोई खाई पाटता हूँ ।
अनिल कुमार शर्मा
16/08/2016




Monday, 15 August 2016

आज सत्तरवीं फसल कटी आज़ादी की
जय बोलो महात्मा ग़ांधी की
कुछ बाढ़ पीड़ित कुछ सूखे में
कुछ भरे पेट कुछ भूखे में
कुछ माल काटते चाँदी की
आज सत्तरवीं फसल कटी  आज़ादी की
सब झंडे डंडे का खेल रहा
किसको कौन ढकेल रहा
जन गण मन गण गाते गाते
अब नौबत आ गयी धक्काबाजी की
आज सत्तरवीं फसल कटी आज़ादी की
कोई नंगा भूखा सोया है
सूखी आँखों से रोया है
कोई सपनो में खोया है
अब राजनीती बन  गयी जनताबाजी की
आज सत्तरवीं फसल कतई आज़ादी की
दुनिया की रंगीनी में
चादर झीनी झीनी में
चलता चाल महीनी में
कुछ बातें बनी  विचित्र राष्ट्रबाज़ी  की
आज सत्तरवीं फसल कटी आज़ादी की
जय बोलो महात्मा गाँधी की
अनिल कुमार शर्मा
15/08/2016



Sunday, 14 August 2016

अब बासी शब्दकोशों पर
फफूंद की तरह उगे छन्दों में
उलझी हुई कविता
दाद खाज की तरह खुजलाती है
अंतःवस्त्र खोलकर
गुप्तांग दिखाती है
नंगे समय का यह नंगा सच है
ऊलजलूल सी पुरस्कार में गच है
इस बंद समय में कुछ खुलता है
उद्देश्यहीन भी उद्देश्य में झूलता है
फाटक के बाद दरवाजा
दरवाजे  के बाद खिड़की
खिड़की के पल्ले बंद हैं
कली मधुकर और मकरंद हैं
अब तो कविता कातिक की कुतिया है
आलोचक उसपर लपलपाता कुत्ता है
सौन्दर्य पर ऊगा बदजात  कुकुरमुत्ता है
अंधे समय का उदय होता प्रकाश है
पोएट्री मैनेजमेंट का बिग बॉस है
समय और सौन्दर्य से हैट कर खड़ी है
कविता किसी बिस्तर में पड़ी है
पुरस्कार की फूलझड़ी है ।
अनिल कुमार शर्मा
१४ / ०८ / २०१६






ऐ मेरे आज़ाद दुःख
बुद्धिभोजियों के देश में
अब तुझे क्या मिलेगा
लगता है इस  परिवेश से  
कोई ज़मींन सरक रही है
हवाओं का रुख किधर है
नहीं पता किसी दिशा का
अंत नहीं  काली निशा का
सपनों की  तरह टूट जाती है
सुबह होते कितनी जिंदगी
घर जैसा लगते हुए भी
अब यहाँ कोई घर नहीं है
थक गए अब  सारे रास्ते
बाकी कोई सफर नहीं है
कोल्हू के बैल की तरह घूमना
शक्तिपीठ का चरण चूमना
बनावटी सपनों के ढेर में
बाज़ारू सुख के अंधेर में
पथराई आँखे दुख रहीं हैं
सुख की दुकान सजाये
अब जिंदगी सूख रही है ।
अनिल कुमार शर्मा
१४/०८/२०१६





Sunday, 31 July 2016


अब तो पतनशील प्रवृति वाले
प्रगतिशील  झंडा उठाये फिर रहे है
विचित्र विवाद में घिर रहे हैं
अब तो न कथा है न व्यथा है
चापलूसी का एक जत्था है
किसी मुर्दे की टांग हिलाते है
बूढ़े को जवानी पिलाते है
उकठे पेड़ को पानी दे  कर जिलाते है
एक भूत टाँगे  घूम रहे है
फटा जूता चूम रहे है
जूते से ज्यादा जूते की हनक है
टूटे बर्तनों की खनक है
एक विचित्र सनक है
चरणधूलि के लिए आमादा है
शाह और प्यादा है
आलोचना का दादा है
अनिल कुमार शर्मा
31/07/2016



Thursday, 30 June 2016

आदमियों के भीड़ में
एक टुकड़ा आदमी खो गया
 सिर्फ आदमी छोड़कर
वह बहुत कुछ हो गया
विज्ञानं के चकाचौंध शहर में 
राजनीति के खण्डहर में
विकास के ज़हर में
खुद के बनाए घर में
बेघर की तरह रहता है
स्वयं  को सहता है
खुद को खुद से कहता है
अब तो सब की दबी ज़बान है
तीर और कमान है
जो खुद को बेधता है
हवा में कुछ फेंकता है
भगवान बनने की ख्वाहिश में
अंदर के आदमी को मारता है
सद्भावनाओं को फाड़ता है
आदमियत  काढता है
नए पाखण्ड में ढालता है
अनिल कुमार शर्मा
01/07/2016




Wednesday, 29 June 2016

That man has past, present and future
Thus constructs and deconstructs the history
After that all he can't solve the mystery
This is the play of reason and pure logic
Of glorious past and present so nostalgic
Of subaltern's suppressed past and
Now agitating  progressive future
Why is such establishment's furor ?
I accept all that history of  denial 
Royal empire and servants so loyal
This dispute of the ruler and the ruled
Always burnt so fierce and being cooled
Who is so cleaver and who is being fooled
This is the journey of to and fro
Ruin of the glory and  glory of the grow
Anil Kumar Sharma
30/06/2016










Monday, 27 June 2016

दुनिया का दुःख गाते जाओ
दुनिया का सुख पाते जाओ
नेता या धर्मात्मा कहलाओ
दूध से पत्थर को नहलाओ
बस अपना गाल बजाओ
स्वप्नों के कारोबारी
जटा या खद्दरधारी
रूप तेरा सरकारी
बाबा हो इच्छाधारी
दुःख की जनता मारी
साधू बना बनिया
योग का नचनिया
माया में  ठगिनिया
बुझा ज्ञान की अगिनिया
बेच रहा नून तेल धनिया
घर छोड़ भूमंडलीकरण अपनाओ
धरती को खालिस जहर बनाओ
पर्यावरण में प्रदुषण फैलाओ
और विकास का गाना गाओ
कृत्रिम जीवन में मौत बुलाओ
दुनिया का दुःख गाते जाओ
दुनिया का सुख पाते जाओ ।
अनिल कुमार शर्मा
28/06/2016


Wednesday, 22 June 2016


This master and slave within me
Reign and being reigned by vice
The dark and light spark inside
 Flowing torrent of abuse so nice
Shade of wisdom grass of ignorance
Prevents ever spreading sun light
Friends! I dwell in such a time of
Moaning day and laughing night
Vase full of blooming flowers
Fields full with cracks of drought
Clouds are roaming rain-less
Home of life and death so bought
Anil Kumar Sharma
22/06/2016











Friday, 17 June 2016

This felt world and this known world
Translated into so many languages
What we perceive and what we grasp
This is the limit of our understanding
And we know nothing about unknown
We thrust a needle in the husk of facts
To this limit we get a limited principle
Surrounded by unlimited exceptions
Have you any information about the being?
What is the beginning and what is the end
What is the purpose of this life of binge
Yet we need moral, yet we need law
Why do we hide our utter flaw?
What is the foundation of manifested world
Swinging between acceptance and denial
Celebrate the victory on crushed conquered
Power sings always in the tradition
Deprived felt always alienation
Disperse on this groundless ground
Illusion of finding almost unfounded
Creating grounds for baseless grounded
Life is confounded in reason and feeling
Play of such annoying and healing
Whose this profit? Whose this dealing?
Anil Kumar Sharma
17/06/2016













Tuesday, 14 June 2016

Flowers are good
Blooming day and night
Grasses are up right
Such a divided fight
What a pretty illusion!
God and devil
Heaven and hell
Moving nose to tail
In this voluptuous trail
Standard and scales are frail
Peaceful crime and boastful good
Friends, we are not out of woods
Thrashing all moods in no mood
Sit in the room and see the vision
Advertisement of so much provision
Market is high, shelter is low
Capital plays from tip to toe
Alas! we are humane
Across the whole universe
Enclosing the globe into a purse
Liberated in the liberal curse
Nice sales of shelter and food
In this rented vase
And exhibited canvass
Look the enticing falsehood
Blooming flowers are good.
Anil Kumar Sharma
14/06/2016













Monday, 13 June 2016

यह देश लगभग सत्तर साल का बच्चा है
कुछ पका  तो अभी कुछ कच्चा है
हमारी जाति का गुंडा
तुम्हारी जाति के गुंडे से अच्छा है
जनता जनता से कहती है
जनता जनता से सुनती है
मन ही मन बहुत कुछ गुनती है
अपनी जाति   अपना  जनादेश है
एक विचित्र बहुमत का सन्देश है
इसमें राधा और घनश्याम है
दुर्वासा और परशुराम है
शास्त्रों में ब्राह्मणवाद है
संविधान में दलितवाद है
मनुवादी और अम्वेडकरवादी है
कही पर तो आतंकवादी है
सहमे सहमे  से गांधीवादी हैं
शहरो में पूंजीवादी हैं
जंगलों में नक्सलवादी हैं
संस्कृति उपभोक्तावादी है
सभ्यता अतिवादी हैं
संत हाईटेक हैं
कितने तो दिलफेंक है
इसी तरह हम बन रहे हैं
अपने सीने पर तीर की तरह तन रहे हैं
अनिल कुमार शर्मा
13/06/2016

Sunday, 12 June 2016

Trees are rare
The sun is so flare
Riverbed with hard mud
Such a season of dud
This is  the happy surreal  city
Filled with merciless pity
Crowd of rattling machines
Air filled with smoke and dust
This iron-man is covered with rust
What have been conquered?
And what the loss we sustain
Shining nights with dark days
This culture of lesboes  and gays
We are cheated by our own knowledge
With grand theories and spoiled college
Man is hollow  and culture is dead
This is the civilization of garbage
Inventions of use and throw
What do we have to grow?
This is a nasty piece of work
Cost of all things is perking up
Nice follies and brutal gifts
Vanishing shores and rifts
Where is life, where is nature?
All the values bind in fetters.
Anil Kumar Sharma
12/06/2016









Friday, 10 June 2016

Heaps of light
Heaps of dark
Take an onion
Peel its bark
This is the mystery
Of structure and
Deconstruction
Of nothingness
And existence
Pour your mind
Boil your intellect
Scatter all the intact
My name is such and such
Your name is so and so
Difference of meanings
Difference of languages
Problem is the same
This is merely name game.
Anil Kumar Sharma
10/06/2016





Thursday, 9 June 2016

                      बुद्धिधंधी
ज्ञान के कतरन को विचार में लपेटकर
उसी दही में पानी डालकर मथनी को फेंटता है
दूध और दही को परिभाषित करने में
किसी नए गधे की तरह रेंकता है
यह जो आदमी है
एक क्रमबद्ध इतिहास है
एक अजीब गले की फांस है
स्मृतिओं के जाल में फँसी घटनाओं की व्याख्या
जहाँ से देखो वही से शुरू होती है
जेहन में कोई नयी आग बोती है
जंगल से निकल कर गांव और शहर में बसना
परिवेश को जहरीली तकनीकियों से डँसना
खाने के लिए पकवान भरी थाली है
विज्ञानं और दर्शन की जुगाली है
जमीन पर होते हुए ज़मीन  से उठता है
आसमान में ताकते हुए ज़मीन को लूटता है
सत्ता की जाल में फँसी ज्ञान -विज्ञानं की व्यवस्था
ये बता कि  सत्ता का विकल्प क्या है?
आदमी तुम्हारा संकल्प क्या है ?
तर्कजाल और विश्वासजाल के फंदे अजीब हैं
इसी में कुछ खुशनसीब तो कुछ बदनसीब है
विकास के सपने और हक़ीक़त में कुछ मंदी है
खेमे के ऊपर खेमे और बेहतर गोलबंदी  है
अजीब तरह का खेल खेलता बुद्धिधंधी है ।
अनिल कुमार शर्मा
10/06/2016







तुम फूल की तरह हंसती हो
मैं कांटो की तरह चुभता हूँ
तुम कविता  की तरह गूंजती हो
मैं किसी गद्य की तरह ऊबता हूँ
तुम शीतल चांदनी की तरह फैलती हो
मैं गरम  सूरज की तरह डूबता हूँ
हवा की खुशबू में तुम्हारी महक मिलती है
पक्षी के चहकने में तुम्हारी चहक मिलती है
अँधेरे में रोशनी सी तुम्हारी झलक मिलती है
भोर में जैसे कोई चम्पा की कली खिलती है
मंद समीर सी जब तुम्हारी स्पर्श मिलती है
जैसे तपती  धरती पर बारिश की बूँद गिरती है
और आकाश में सावन की घटा घिरती है
स्वाति की बूँद जैसे पपीहा को मिलती है
सीप में जैसे कोई मोती बनती है
दिल में  गीत की तरह तुम  बजती हो
वीरान में किसी बाग सी सजती हो
अनिल कुमार शर्मा
09/06/2016






Sunday, 5 June 2016

यह जो आग है
जलती भी है
और जलाती भी है
मुट्ठी भर भभूत  लिए
जो इस आग का इतिहास बताते है
वे अधजले लोग है
चूल्हे की आग
और जंगल की आग
एक होते हुए भी  एक नहीं होती है
कभी कभी तो आग पेट में भी लगती है
और उससे बड़ी आग दिमाग में होती है
अग्निसुक्त के मधुच्छन्दा वैश्वामित्र  से पूछो
वह कौन सी आग थी जिसे ऋचाओ में आबद्ध कर
यज्ञ में आहुति बनाकर
देवता अग्नि की प्रशंसा में गाया  गया
सभ्यता की प्रथम खोज वेद के प्रथम देवता
ये बता कितना जलते हो ,कितना जलाते हो?
तुम्हारे तेज में भी कुछ धुवाँ धुवाँ सा है
जो जलने से शेष रह जाता है
विनाश के बाद भी कुछ अवशेष रह जाता है
यह कौन सा चीज है
लगता है सृष्टि का कोई बीज है
अनिल कुमार शर्मा
06/06/2016




Saturday, 4 June 2016

देश का दुःख
और विदेश का सुख
समस्याओं के उबलते कड़ाही   में
कुछ तो छन रहा है
मेक इन इंडिया बन रहा है
देश तुम दुकानदारों के लायक बनो
निवेश के लिए मंगलदायक बनो
जिंदगी के ऊपर जहर की तरह
मड़राती हुई भूमंडलीकरण की दुनिया
उपभोक्ता और उपभोग के बाजार में
नए तरह के रचे हुए संसार में
पहाड़ों का धंसना और सागर का उफनना
जंगलों का कटना और नदियों का सूखना
अब परिवेश के दर्द को कौन समझेगा?
विनाश  के राह पर विकास का कारवां
चेहरा शून्य आदमी की तलाश में
यह भीड़ किधर जा रही है ?
किस परिवेश का गीत गा  रही है ?
अनिल कुमार शर्मा
05/06/2016









Friday, 3 June 2016

आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा कोई बेईमान चेहरा
 मंच पर जब  ईमानदारी की बात करता है
तो लगता है इस  कोढ़ में कोई खाज पलता है
वे सुनाते है हम गूंगे बहरों की तरह सुनते है
अपने माननीय को बड़ी शिद्दत से चुनते है
व्यक्ति से ज्यादा अपराधी कहीं  व्यवस्था है
उदार होते  विश्व  की अब यही अवस्था है
पेट के साँचे के बाहर  यह भूख की दुनिया
गोदाम से निकलकर शोरूम में सज रही है
विज्ञापन के रंगीन  संगीत में बज रही है
जमीन छोड़कर कोई जमीन बनाने की  जुगत है
विदीर्ण होते परिवेश के नरक में यही भुगत है
अपने सर पर जब अपनी ही बनायीं  छत  गिरती है
खुद की संगीन जब अपने सीने को चीरती है
अपने बचाव में बनाए गए सभी हथियार
जब उलटकर  खुद अपने पर ही चलते है
तब हम किसी  क्रांति के साँचे में ढलते है
जब व्यक्ति और समाज का ढांचा
मूल्यहीन सत्ता के बोझ से चरमराता है
व्यवस्था का ढूह  टूटन में भरभराता है
जिंदगी के कोने में कोई उम्मीद जगती है
टूटे हुए साज पर कोई नयी राग बजती है
खंडहर में कोई नयी इमारत सजती है ।
अनिल कुमार शर्मा
०३/०६/२०१६















Tuesday, 24 May 2016

लमही के घूरे पर उगे कुकुरमुत्ते के साये में
कुछ काशी कुछ केदार कुछ विश्वनाथ पल रहे है
एक परम्परा से दूसरी परम्परा में ढल रहे है
एक विचित्र हिंदी पहनकर चल रहे है
यह हिंदी मुझे उसी तरह आती है
जैसे नई बहू ससुर के आगे शरमाती है
घुँघट में रसमलाई खाती है
भसुर से नहीं छुआती है
रचना के पंख पर बैठकर
आलोचना से पीछा छुड़ाती है
 रचना सरस्वती के हाथ में
 झंकृत वीणा की  उदात्त राग है
आलोचना सरस्वती को ढोता हंस है
नीर -छीर विवेक का सुधी परमहंस है
कला इसी चाल से चलती है
रचना सम्यक आलोचना में पलती है
शाश्वत परम्परा के ये मूल्य हैं
विवेचना इसी सीमा के समतुल्य है
टुकड़े- टुकड़े बटे  ज्ञान को
साहित्य एक धागे में पिरोता है
इसी में आदमी पशु से मनुष्य होता है
यही बात लमही के घूरे में सड़ गयी
कुकुरमुत्ते के आँख में रोशनी मर गयी
अब रंगीन चश्मे जेब में है
आदमी का रंग फरेब में है
अब तो रचना में चापलूसी है
चावल में ज्यादा  भूसी है
आजादी के बाद की  यह पहलौठी है
दूसरी परम्परा को ढोता कोई चौथी है ।
अनिल कुमार शर्मा
२४/०५/२०१६







Saturday, 7 May 2016

आज इस दहकते हुए समाज में
मैं अपने भीतर के आदमी के खिलाफ हूँ
गुदगुदी तकिया और रंगीन लिहाफ हूँ
नारियल की तरह भीतर कोमल
बाहर रुखा और  बेहद कठोर हूँ
स्वादहीन अनुभूति समेटे हुए
भाषा और शब्द में  चटोर हूँ
कुछ  रस भी  रिसता है
भाव और सन्दर्भ किसका  है?
इस अजीब सी दुनिया में
कितने तरह का संसार पिसता है
रोज रोज कितने चेहरे बदलते है
मरी हुई ज़मीर पर सजते हैं
बनावटी सरोकारों में लिपटकर
पाक साफ और निष्पाप हूँ
आज के इस दहकते हुए समाज में
मैं अपने भीतर के आदमी के खिलाफ हूँ ।
अनिल कुमार शर्मा
08/05/2016



इस उजड़े हुए घर में
कुछ सजे हुए लोग रहते है
कितने संयोग -वियोग रहते हैं
एक तमाशा है इस जिंदगी में
या जिंदगी ही एक तमाशा है
एक चाल है तो  दूसरा पासा  है
एक चलता है दूसरा चलाता है
किसी की जड़ कोई हिलाता है
नयी नयी उम्मीद पिलाता है
अब इस उजाड़ खण्ड में मैं  भी हूँ
तूफान में उजड़े घरों की तरह
अकाल में अधमरों की तरह
अब तो लूटी रोशनी में
रंगीन अँधेरे चमकते है
अब तो सजे हुए लोग ही
उजड़े हुए लोगों का माल गटकते है
अपने असली सिर को बचाकर
हमारे लिए नकली माथा पटकते हैं
और किसी पतली गली से सरकते हैं
अनिल कुमार शर्मा
07/05/2016












Thursday, 5 May 2016

तुम्हारे होठ इस कदर हिलते हैं
जैसे बिखरे हुए गुलाब मिलते हैं
कली चटखती है
रजनीगंधा गमकती है
तुम्हारी निगाहों में कोई
रोशनी चमकती है
प्रकृति की सारी मनोरम छवि
क्यों तुझमे ही समायी है
क्यों तुम्हारे रूप में
मेरे हृदय की ख़ुशी बन आयी है
चिड़िया चहकती है
चमेली महकती है
तेरी सांसों में होकर
मेरी साँस चलती है
इसी तरह मेरे अरमान खिलते हैं
तुम्हारे होठ इस तरह हिलते हैं
जैसे बिखरे हुए गुलाब मिलते हैं ।
अनिल कुमार शर्मा
05/05/2016

Sunday, 1 May 2016

समय में जो टिक नहीं सका
उस इतिहास को टिका रहा हूँ
लहकते पेट की मजबूरियां
और स्वप्निल क्रांति का तर्क
सभी दुष्चक्रों को उखाड़ते हुए
क्यों खुद उखड़ गया ?
स्वप्न का  झनझनाना 
और नींद भी अधूरी
विभ्रम और यथार्थ की दूरी
समय और चाल दोनों थके -थके से हैं
विचार और विचारधारा पके -पके से हैं
एक धुंध के बीच स्वप्न चाल चल रहा हूँ
किसी खामोश अतीत में ढल  रहा हूँ
भूख भी वही है चीत्कार भी वही है
बस एक साजिश ही नयी है
नए सवालों के सन्दर्भ भी
पुरानी हाड़ी में पका रहा हूँ
समय में जो टिक नहीं सका
उसे इतिहास में टिका रहा हूँ ।
अनिल कुमार शर्मा
01/05/2016
( सभी को  मई दिवस की शुभकामनाऍ )






Wednesday, 27 April 2016

यह बेतुकी सी जिंदगी
जाने  किससे तुक मिलाती है
कितनी उम्मीदें जिलाती है
कुछ रंग और नूर पिलाती है
जिंदगी की वादियों में गुजर रहा हूँ
किसी अप्रत्याशित  भय से डर रहा हूँ
खोखले अस्तित्व में कोई मूल्य भर रहा हूँ
इस ज़माने का सच किधर है ?
रंगीन झूठ तो इधर है उधर है
सच पर लगी किसकी नज़र है ?
लिफाफे में भरी यह  जिंदगी
जाने किस पते पर जाएगी
कौन सा सन्देश लाएगी
यह उम्र किसको तलाशती है
किसकी तक़दीर तराशती है
अपने ही कुनवे में इस कदर अकेला हूँ
सिर्फ अपनी तक़दीर का खेला हूँ
ऐ जिंदगी ये बता कैसा झमेला हूँ ?
अनिल कुमार शर्मा
27 /04 /2016





Sunday, 24 April 2016

उन सपनों का क्या हुआ
जो देखे गए थे
 कुछ हमारे लिए
कुछ तुम्हारे लिए
नींद पूरी होने से पहले ही
वे टूट गए, फुट गए
सपनों की विरासत लूट गए
अब तो बाजार में सपने बिकने लगे है
तमाम प्रचार में दिखने लगे है
अब  सपने दीखते नहीं है
सिर्फ दिखाए जाते है
किसी अबूझ किताब में लिखी
किस्मत की तरह लिखाए जाते है
पहेली की तरह बुझाए जाते है
हमारे पेटों  से असली  भूख निकालकर
बनावटी नकली भूख से सजाए जाते है
छोटे अबोध बच्चों की तरह हमलोग
सपनो के झुनझुने से बझाए जाते हैं ।
अनिल कुमार शर्मा
24/04/2016



               BOOK REVIEW OF “ KANGAL HOTA JANTANTRA” BY Dr. VIKRAM SINGHAL

This is not to present a critic of the book but an attempt to test myself , as to how much have I understood the personality, and person of my friend, the author, Mr Anil Sharma. By recording my understanding of his poems, I am expecting an endorsement, of being receptive enough during our short but intense interactions that we shared, a few years back, at his hometown usually under the watch of our common benefactor PN Sir.
My presuppositions regarding his intellectual outlook, shall colour, my analysis of the present work, and shall also reflect upon my own convictions as well as pretentions, especially towards theoretical grounding of social and spiritual phenomena.
That life may be simple and uncomplicated is the fundamental assumption, in this collection. That the inconsistencies of human mind are both the inductive and deductive quotient of the inconsistencies and complications of the society, which makes it impossible to form any cogent social imagination, and thereby incapacitating the individual to make ontological choices , so as to express his identity and desires.  These fallacies extend to both,  faith and logic, of the person .hence the individual is both the villain and the victim , of this complicated world.
  “Ishwar hone ka kitna bada prapanch”
“prapanch”  or ‘phenomena’ ,  the ‘bundle’ of meanings, often created by language, when crosses the intellectual capacity of its weaver , presents itself as the indiscernible GOD.
      “ apne svakrit ishwar ki sthapna mein”
The solipsist shall ever be in his trance.
“ekangi soch ke nashe me ab jaagti hui neend aadhi hai”
This tussle of the simple with the complicated, with all the detailing by information and facts external to the reality, is reflected in the tug of war between the simplicity of faith and the complications of reason.
“Aasthe ki safedi lagati ho tum, buddhi ki kalikh main pot deta hoon.”
But these inconsistencies and fallacies are equally distributed , between faith and reason. This leads to the greatest of ‘dilemmas’ ,choosing between trivializing the truth or Chaos. This tussle becomes more evident  when the poet’s thought process becomes laboured. The ‘immediate’ interaction of thought , thought process and consciousness is lost.  Using simplistic theoretical  explanations loses the reality and trivializes the truth where as trying to collect particulars of the present causes a chaos, where the reality and its relation to the self and identity of the person is lost.
“ye sochkar main sochta hoon ki kya sochun”
“aadmi cheej ki haqiqat kya hai, duniya me jeene ki jarurat kya hai”
By now the dichotomy of the real and the phenomenal seems complete, and it is also evident that reason is able to apprehend only the phenomenal and not the real. And this limitation of reason affects the person’s cognition and behaviour.
“badi koshishon se na idhar dekhta hun na udhar dekhta hun, ae shaitan si duniya tujhe hu-ba-hu dekhta hun.”
 What then obstructs this apprehension of the real?
“jneya matra avalamban jo ho , par sthul nahi, ye sukhsma nahi.”
For the real is neither material nor immaterial and reason equipped with only five senses and logic may not apprehend it. Faith on the other hand has lost its credibility and is no longer a trusted source of knowledge.  Even this realization of the inapprehensibility of the real is lost upon the collective consciousness which turns both parasitic and saprophytic, upon itself and its sentience.
“soshan ka samajik anubandh , parjivi sanskaron mein doobi hui rachnayen.”
The harmony between change and continuity, unity and duality, is the next challenge before this inability of apprehending the real . how then do we relate any two entities, objective or incidental. The evolution of truth , the reification of the dialectics is stymied.
‘sari sambhavnayen thos hote samay me jam kar chattan si ban gayi hain.’
Identity is the product of continuity and unity, which provides some certainity and thereby some succour, in the midst of this unending struggle. This identity may itself turn into an inconsistency in a fight for survival against other identities, or it may serve as a firm bedrock, for the poet to stand upon, by acting as a Kantian category, processing the real, the ‘phenomena’lization of the noumena. So that the person may be able to accept the perceived as a derivative of the real and proceed further. But as seen above this dilemma is not resolved and the crisis of identity persists.
“bada hi up-to-date hoon. Har taraf se uprooted hoon , har jagah apravasi hoon, mai global village ka nivasi hoon.”
Lost sentience, leads to loss of confidence on reason, and faith already denounced , the recipe for an alienated self is complete.  This alienated existence is evident in the supremacy of the market and ideology, each is a claimant to being a greater phenomena  than the other.
As the amount of facts and information  multiplies, the words become heavier and the speaker is no longer the master, the words assume meanings independent of the speaker. Trivializing ideologies are set in a time warp blissfully unaware of the swelling of the words and definitions, and the ever experiencing individual is left with no choice, but to use these incomplete and misleading dictionaries further alienating him.
“ shabdon me sarthak kam, jyada nirarthak hoon.’
“ bhasha aur vibhasha ka tark milata hoon, shabdon ko naya arth pilata hoon.”
As markets become Orwellian,  using the chaos of details to intimidate the individual to withdraw into the shell of consumerist existence. The choices forced upon him confound both his identity and desire, to an extent that even the Cartesian cogito is no longer beyond doubt. Markets assume the form of a huge monolith which has become the new order and determines the keystone of ethics. Has profit come to replace ‘good’ are both synonymous or analogous as the order changes.
“ jiska gala tai mein aintha hai,jo dil ko dimag me jane se rokta hai.”
“ab prakriti bazaar me samaa rahi hai............ab dharti batue me samaa rahi hai.”
Alienation may be expressed both ways, egoistic renouncement or fatalistic withdrawal. Either you decide that the world is no longer worthy of your indulgence, or that you are no longer capable of indulging in it.
“ab ye desh na to tumhare layak raha, na hi mere layak raha.”
As one withdraws, the phenomena seem transcendent, and as one renounces, they seem immanent. Confounded by variable perceptions, one may find it beyond the epistemic limits , may be overwhelmed by its ubiquity.
“ raja Bali ke yajna me vaman avatar hain, he bhagwan; bhrastachar hain.”
We may go on taking examples , and may explore an unending series of facets of this dilemma and its corresponding alienation, but I feel that we need to go beyond observations. That this work has illustrated the above observations in the most obvious manner and no esoteric conversation or harangue is resorted to, yet it stops short of committing itself. Coming back to the basic assumption of the possibility of a simple and uncomplicated world, it is expressed only in lamenting its absence. The anguish of the lost paradise very well affirms the alternate reality which is there for the taking only a phenomenological reduction stands in our way. For the ‘real’ is always present and available. While my friend may appear to be Kafkaesque, expressing no hope for our alienated (sinful,false,faithless) life, he has kept the torch burning high, albeit only in individual consciousness and not in collective consciousness.
I may still ask of him that the trend of poems written over more than 20 years , from prime youth to middle age, they show remarkable consistency in their assumptions, and the anguish expressed is relentless. Has hope not crossed you once, do you not identify yourself in any of the countless human endeavours that keeps the light glowing in each of the individual consciences.  I hope to read differently in your next book.
                                                                                                                           Dr Vikram Singhal
                                                                                                                                                 (I.A.S)
                                                                                        Plot No. 23, Delhi Government Officer’s Flat
                                                                                                           Greater Kailas-1, New Delhi
                                                                                           






Saturday, 23 April 2016

प्रेमचंद का कफ़न ओढ़े
साहित्य में कितने घीसू -माधव
अधजला आलू बीन कर खा रहे हैं
बुधिया को प्रसव में तड़पा रहे हैं
यह तो समय का खेल है
दिया में भी नकली तेल है
जलता कम जलाता ज्यादा है
आलोचना का नया प्यादा है
गुल्ली डंडा खेल रहा है
मोटेराम शास्त्री को ठेल रहा है
कहने को बड़ा दानी है
खेल में गलदानी है
दूध में पानी है
प्रेमचंद का फटा जूता सी रहा है
लमही के घूरे पर जी रहा है
अब ये नए तीर्थ पर जा रहे है
प्रेमचंद का कफ़न ओढ़े
साहित्य में कुछ घीसू - माधव
 अधकचा आलू खा रहे हैं
अनिल कुमार शर्मा
23/04/2016





Wednesday, 20 April 2016

मित्र जो तुम्हारे मन में है
क्या उसे उसी तरह कह दोगे
कहकर क्या  जिन्दा  रह लोगे
 मैं तो कफ़न में से बोल रहा हूँ
कब्र में जिंदगी टटोल रहा हूँ
कुछ कटे   हुए अब  हाथ है
कुछ बँधे हुए से  पाँव है
ये थके थके से गांव है
जहाँ रोज कोई जिंदगी मरती है
विकास के दानव से डरती है
लोकल विलेज को ग्लोबल विलेज खा रहा है
मेरा देश किधर से किधर जा रहा है
इस नरक  का  ग़ज़ल  कौन गा रहा है
अब तो कान पक गए हैं
इस चमक में फटे पांव ढक गए हैं
खेतों में मौत की फसल उग रही है
चमकती अर्थव्यवस्था जिंदगी चुग रही है
 लगता है कोई कस्ती डूब रही है|
अनिल कुमार शर्मा
20/04/2016






Saturday, 16 April 2016

अनिल कुमार शर्मा की कविता में सत्य का स्वरुप
अनिल कुमार पाण्डेय
शोधार्थी, हिन्दी-विभाग,
पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़,
160014
मो०-8528833317
            कविता अपने समय के सत्य को रूपायित करती है | ऐसा करते समय उसे इस बात का भय विल्कुल नहीं होता कि सामने वाला क्या सोचेगा? क्या प्रतिक्रिया देगा? संभव है कि जिस दिन कविता में भय की यह गुन्जाईस हो अथवा यह सोचने की समझ जगे उस दिन कविता सच्चे अर्थों में कविता के स्वभाव में न होकर प्रशस्ति-पत्र का रूप धारण कर लेगी | इस अवस्था में एक रचनाकार का कवि के रूप में प्रतिष्ठित होने की संभावनाएं भी लगभग हाशिए पर होगी | यदि घटनाओं का मानव-समाज में घटित होना स्वाभाविक है और उसका किसी न किसी रूप में सामना करना मनुष्य की नियति है तो फिर स्वाभाविकता और नियति की स्थितियों को साकार रूप देते हुए जनसामान्य से उसका प्रत्यक्ष साक्षात्कार करवाना कविता का दायित्व है | साहित्य-जगत् में इस दायित्व का निर्वहन कवि-कर्म द्वारा ही संभव है | स्वार्थता की कितनी ही बड़ी मानसिकता लोगों में क्यों न घर कर गयी हो पर कहीं न कहीं “संतन को कंह सीकरी सो काम” की-सी भावना तो कवि-मूल में होता ही है |
         जहां और जिस कवि अथवा जिस कार्य में ‘सीकरी’ की चिंता होगी वहाँ निरपेक्षता न होकर चाटुकारिता, स्वार्थता और गुटबंदी की भावना अधिक रूप में व्याप्त होगी | गुटबंदी और चाटुकारिता की भावना से वर्तमान साहित्य और समाज दोनों प्रभावित हैं | समाज में अर्थ को जितनी तेजी से महत्व देने की प्रवृत्ति इन दिनों बढ़ी है वैसी प्रवृत्ति मानव-समाज के शायद ही किसी युग में रही हो| आश्चर्य तो इस बात का है कि इस प्रवृत्ति से परसान भी सभी हैं और हैरान भी पर इसे नकारने या इसका प्रतिरोध करने की क्षमता किसी में नहीं दिखाई दे रही क्योंकि इसके मूल में लालच है | अर्थ का, सम्मान का, मान का| परिणामतः गुटबंदियों में बंधकर किया गया कार्य न तो वर्तमान समय के लिए हितकर हो पा रहा है और न ही तो आने वाले भविष्य के लिए किसी प्रकार का शुभ-संकेत देने में कामयाब | सवाल ये है कि जो समाज अपनी विकासशील प्रवृत्ति के लिए जाना जाता है और जहां विचारों के केंद्र में सभी व्यवहारों का घटित होना स्वाभाविक समझा जाता है, वहाँ समाज और साहित्य की निरपेक्षता का दंभ भरने वाले लोग आखिर इसे किस दिशा और दशा में देखने का प्रयत्न कर रहे हैं? चिंता का विषय यह भी है कि क्या वे चाहते हैं कि सभी वास्तविक स्थितियों से अपना ध्यान हटाकर जो जैसा हो रहा है उसे उसी रूप में स्वीकार कर लिया जाय? पता यह भी है कि झूठ और अहंकार के दंभ पर बनी ईमारत ज्यादा दिन टिकने के बजाय जर्जर होकर ढह जाती है| क्योंकि कहीं न कहीं वास्तविक स्थिति की पहचान तो सबको होती है, वह न बोले ये बात और है; पर ऐसा तो नहीं है कि सभी की निगाहें उस स्थिति को समझने और जानने की प्रक्रिया से अछूती रह जायेंगी? यह तो सत्य ही है कि सत्य को कितना भी झुठलाने और नकारने का प्रयत्न किया जाय परन्तु उसका पारखी तो उस झूठे नकार की  वास्तविक स्थिति को लोगों के सामने रखने का प्रयत्न करेगा ही | कवि और कवि-हृदय से निकलने वाली उसकी कविता इसी प्रयत्न के प्रतिरूप हैं |
      वर्तमान समय को केंद्र में रखकर रची गयी ‘कंगाल होता जनतंत्र’ कविता-संग्रह साहित्य और समाज में व्याप्त झूठे प्रतिमानों को ढूँढने का एक सशक्त माध्यम है | संभव है कि इस माध्यम पर भविष्य में कई प्रकार के आरोप-प्रत्यारोप भी लगाए जाएं; पर सच्चाई यह भी है कि कवि को इस बात की विल्कुल परवाह नहीं है | न तो समाज के उन नुमाइंदों से, जिनके जरिये कितने ही साहित्यकार अपना घर-गृहस्थी चला रहे हैं और न ही तो साहित्य के उन पुरोधाओं से जिनके छत्र-छाया में रहते हुए स्वयं को लब्ध-प्रतिष्ठित  घोषित कर चुके कवि, आलोचक एवं रचनाकार समाज में वाहवाही लूट रहे हैं |
         जबकि साधारण जनता, जो इन दोनों  स्थितियों से निरपेक्ष है, जिसकी सुध न तो समाज के नुमाइंदों को है और न ही तो साहित्य के पुरोधाओं को हाँ, तरफदार दोनों हैं | जनता की बात को, उसके जज्बात को अपने उद्देश्यों की पूर्ती होने तक तो ये उसके हर कदम दर कदम पर आने वाली समस्याओं का जायजा लेना अपना कर्तव्य समझते हैं पर जब ये प्रतिष्ठित हो जाते हैं, उसे भूलने में कोई कसर नहीं छोड़ते |  ‘कैसे मेरे ये रहनुमा हो गये’  नामक कविता में अनिल शर्मा इसी प्रवृत्ति को रेखांकित करते हैं |
‘झोपड़ी से आवाजें उठाते चले,
महलों  में  जाकर  कैद्नुमा  हो  गये |
जमीन  की  बातें  सुनाते-सुनाते,
हकीकत  में  वो  आसमानुमां  हो  गए||
सूखी हड्डियों में लहू को जगाते-जगाते,
न जाने कब वो चर्बीनुमां हो गए |
बदबू तो जस की तस बजबजाती रही
न जाने कहाँ से वो खुशबूनुमां हो गए||”1            
        शर्मा की ये काव्य पंक्तियाँ वर्तमान समय के सच को बहुत ही सुन्दर तरीके से अभिव्यक्ति करती हैं | पहली दो पंक्तियाँ जहां मार्क्स का झंडा उठाए झंडाबरदारों के सत्य को उद्घाटित करती हैं वहीँ अंतिम की दो पंक्तियाँ उन्हीं झंडाबरदारों के साथ आवाज बुलंद करने वाले साहित्यकारों के सच को सामने रखती हैं | ध्यान देने की बात ये है कि मार्क्सवादी विचारों का आगमन भारतीय परिवेश और हिंदी साहित्य में लगभग थोड़े-बहुत अंतराल के बीच साथ-साथ होता है | सामाजिक तबके के बहुत से लोग मार्क्स दर्शन की सफलता का स्वप्न भारत में देखने लगे | उन्हें लगभग यह आभाष भी होता रहा कि दिनों दिन क्रांति की लहर आएगी और पूंजीवादी संस्कृति का पतन हो जाएगा | ऐसा होना संभव भी था क्योंकि कभी भी किसी भी बदलाव का संकेत समाज में विचार ही लाते हैं | परन्तु दूसरों को नसीहत देकर स्वयं आदर्शों का उलंघन करना स्वयं की जिंदगी को तो बर्बाद करता ही है अपने साथ साथ दूसरों को भी ले डूबती है | ‘बदबू तो जस की तस बजबजाती रही’ अर्थात जिस गरीबी, तंगहाली और लाचारी से जनसामान्य को मुक्त कराने की बात मार्क्स दर्शन और उससे प्रभावित साहित्य में की जाती रही उसके पुरोधा, इसमें कोई शक नहीं है कि, स्वयं फाइव स्टार होटलों में विलासिता का जीवन वहन कर रहे हैं | जो गरीब अपने स्वप्नों का उड़ान लिए इनके आन्दोलनों में सहभागी हुए, कितनी विडंबना की बात है, न घर के हुए न घाट के हुए| ‘कॉमरेड का असर’ कविता में कवि कामरेडों के इसी झूठे प्रभाव को बेनकाब करता है| कवि मानता है कि झूठी क्रांति का झांसा देकर
“वो ऐसा गरीब ढूढ़ते हैं
 जो लड़ सकें
और लड़ने के सिवा न कुछ कर सकें
वो लड़ाते रहें और ये लड़ते रहें
“तुम्हारे भूख की वजह भरे पेटों की शरारत है”
यही समझते हुए......
एक ऐसी दुनिया गढ़ते हैं
जहाँ संघर्ष के सिवा कुछ नहीं है
कमजोर टूटी पसलियों पर
सिद्धांतों के कफ़न का मरहम लगाते हुए
ये इन्कलाब के नारे बड़े बेचारे लगते हैं|”2   
         नारे तो कभी बिचारे नहीं होते लेकिन ऐसा न होने के लिए उसमें समर्पण और संघर्ष का होना आवश्यक जरूर होता है| मार्क्सवादी विचारधारा में न तो समर्पण रहा और न ही तो संघर्ष| जिस शोषण को उखाड़ फेंकने के लिए बुद्धिजीवियों ने मार्क्स-दर्शन को अपनाया, उसी शोषण की प्रवृत्ति को अपना सबसे प्रिय कवच इसके रखवालों ने बना लिया| आम आदमी साधारण से अति साधारण में तब्दील होता रहा और ये साधारण से असाधारण में| इनका विरोध परम्पराओं एवं आस्थाओं से सबसे अधिक रहा पर देखा यह भी गया कि जीवन के अंतिम दिनों में ये उन्हीं परम्पराओं को मानते, प्रचार करते अपने जीवन अंतिम क्षण बिताया| जनता इन्हीं विरोधाभासों के मध्य झूलती रही| वह यह नहीं समझ सकी कि आखिर ये बात किस सिद्धांत करते हैं| जिनके सिद्धांतों का कहीं कोई अता-पता न हो उसका व्यवहार कैसा होगा...यह वर्तमान समय के कामरेडों को देख कर आसानी से समझा जा सकता है| ये वही कामरेड हैं जो रातों रात क्रांति लाने का दिवास्वप्न देखते थे, भूख को ख़त्म करके समानता और बंधुत्व का साम्राज्य स्थापित करना चाहते थे| चीखने और चिल्लाने से यदि ऐसा संभव होता फिर कोई कार्य भला क्यों करता? वह धरने और नारे से अपना काम चलाता| ऐसा इन कामरेडों ने खूब साधा भी  लेकिन जब सफलता नहीं मिली तो अराजकता पर उतारू होकर जंगलराज का निर्माण करने पर बल देने लगे| समाज जंगल-संस्कृति को क्यों पसंद करेगा? परिणामतः वर्तमान समय-समाज में इस विचारधारा और इससे जुड़े लोगों को कोई तवज्जो नहीं मिला| कवि इनकी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहता है-
सुनो कामरेडों!
क्रांति के मतभेदों
तुम्हारे लाल झंडे के कई टुकड़े हुए
कि हम रह गए मात्र डंडे पकड़े हुए
अब क्रांति तुम्हें गरियाती है
भूख हाथी पर बैठ कर जाती है
सायकिल भी चलाती है
मंदिर में रखे पत्थर को
गरियाते-गरियाते तुम ढह गये
किन्तु पत्थर तो प्रतिमा बन गये||”3
         यहाँ अज्ञेय की इस स्थापना को ध्यान देना कामरेडों यानि मार्क्सवादियों के दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के लिए आवश्यक हो जाता है | अज्ञेय का स्पष्ट मानना है कि  “संस्कृति की दुहाई देकर परम्परावादी भी बने रहा जा सकता है और प्रतिक्रियावादी भी बना जा सकता है, लेकिन उतना ही सच यह भी है कि संस्कृति के सवाल उठाए बिना न आधुनिक बना जा सकता है, न प्रगति की जा सकती है और न वास्तव में मनुष्य ही बने रहा जा सकता है|”4  जबकि इस विचारधारा के समर्थक संस्कृति का प्रचार प्रसार करने वालों को ढोंगी, रूढ़िवादी और बहुत कुछ कहते आए हैं | यह सत्य है कि परंपरा-प्रियता को इन कामरेडों द्वारा जितनी अधिक गालियाँ दी गयी, परम्पराएं उतनी ही अधिक फली-फूली और विकसित हुई| पर इनके हालत और हालात अनवरत बद से बदतर होते गए| आज समाज में इनकी पहचान उन मौसमी मेढकों की तरह हो चुकी है जो मात्र बरसात होने पर ही टर्रतोएँ टर्रतोएँ करते सुनाई देते हैं | देश में जब भी चुनावी मौसम आता है सब एक सुर से पिल पड़ते हैं आम आदमी का अस्तित्व और स्वयं का व्यक्तित्त्व बोध इन्हें इसी समय आभाषित होता है| कवि की दृष्टि में इनका स्तर बृक्ष की डाल पर लटके ‘सूखे पत्ते’ और बरसात में भीगे हुए सड़े-गले वस्तु के समान है, जिनका उद्देश्य गन्दगी फैलाते हुए विनष्ट हो जाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं होता-यथा
सूखे पत्ते की तरह खड़खड़ाते हो
बरसात में भीगकर सड़ जाते हो
चुनाव में उखड़ जाते हो
एक मंच पर बिखर जाते हो
कई तरह की बोली है
और बन्दूक में भरी गोली है|”5  
           वैचारिक और बौद्धिक दृष्टि से प्रबल और सामर्थ्य मार्क्स-दर्शन के समर्थकों में अब वह वैचारिक एकता नहीं रही| लोभ और लालच में इन सबने अपने अस्तित्व को भुला दिया और कभी इस छोर तो कभी उस छोर में शामिल होकर वैचारिक उठापटक को अंजाम दिया| यह उठापटक अनवरत जारी है| साहित्य, समाज और राजनीति ये तीनों स्थान, जहां मानव और मानवीयता की अधिक संभावनाएं होती हैं, इनसे दूर होकर स्वतंत्रता की मांग करने लगी हैं| जिस वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए जनता का एक बहुत बड़ा भाग इनसे अपना सम्बन्ध प्रगाढ़ करने के निमित्त इनका प्रचारक बना था उस वैचारिकता में अपना अस्तित्व और भविष्य सुरक्षित न पाकर दूसरी वैचारिकता में जगह खोजने लगे हैं| यहाँ एक बात विशेष ध्यान देने की है... राजेंद्र यादव और दलित लेखकों द्वारा तुलसी का विरोध किया जाना, दरअसल स्त्री-संवेदना और दलित-सरोकार यही दो विचार-धाराएं वामपंथी विचारधारा के मूल में थी और जब इनको भी दलित लेखकों ने (दलित-लेखन और संवेदना को) अपना कहा और राजेंद्र यादव ने (स्त्री लेखन और संवेदना को) अपना, यहाँ आकर नामवर समेत कई वामपंथी आलोचकों एवं रचनाकारों को अपना मुख्य स्वर परिवर्तित करना पड़ा| 
           संग्रह की व्यंग्य-कविता  “टालस्टॉय के भाई” के सम्बन्ध में भूमिका के बहाने अपना अभिमत रखते हुए पी. एन. सिंह ने नामवर के जिस वैचारिक उदारता को रेखांकित किया है6 वह इसी विफलता और मोह, लालच का परिणाम है न कि नामवर सिंह की दृष्टि प्रगाढ़ता| तुलसी और कबीर के बहाने नामवर ने कबीर-तुलसी के चिंतन में व्याप्त मूल स्वर को पकड़ने के लिए नहीं अपितु एक नई परंपरा खड़ी करने के लिए प्रयास किया था और जब उसमे सफलता नहीं मिली, विरोध और प्रतिरोध दिखाई देने लगा तो दामन तुलसी का थामे| यह लालच मात्र नामवर द्वारा ही नहीं अपितु उनकी परंपरा के रखवाले उनके समकक्ष और उनके बाद के चिंतकों द्वारा भी किया जाता रहा है| जिसे कवि ‘‘टालस्टाय के भाई’’ के रूप में परिभाषित करता है वह काशीनाथ सिंह ही नहीं अपितु वे सभी हैं जो इनके कारवाँ को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाए फिर रहे हैं| साहित्य जगत में जो कार्य बहुत पहले होना चाहिए था वह अब हो रहा है| आश्चर्य तो इस बात की है कि ऐसा प्रयत्न कवि और कविता द्वारा किया जा रहा है न कि आलोचना द्वारा| जिस बात को समकालीन और सामयिक आलोचक इसलिए नहीं कह पाए कि उनके आका नाराज हो जाएँगे, उस बात को कवि अनिल कुमार शर्मा धड़ल्ले से कह जाते हैं| इनके कहन के इस साहस को यहाँ उद्धृत करना आवश्यक है-
      “एक सेमिनार में/
हिन्दी के टालस्टॉय/
और उनके भाई थे/
टालस्टॉय नें खोमचा लगाया/
भाई ने स्वाद हल्दी राम से उम्दा बताया/
तुलसी दास कबाड़ी थे/
कबीर उम्दा खाँड़सारी थे/
यही आलोचना है/
दूसरी परंपरा को खोजना है/
कालिदास की तरह/
विशाल बृक्ष की शाखा पर बैठकर/
उसे अपने हिस्से की ओर से काट दो/
असली को असली से ही बाँट दो/
यही बात है/दूसरी शुरुवात है/.......
ये आलोचना तो सात अंधों की जुबानी है/
जो एक हाथी के जिस्म की कहानी है
समग्र का खण्डित है/बहुत बड़ा पंडित है|”7  
            समग्र का खण्डित और बहुत बड़ा पंडित होने की घोषणा स्वयं नामवर की है जिसे वे स्वयं स्वीकारते हैं और कई बार यह भी कहा जाता है उनके समर्थकों द्वारा “नामवर लिखते नहीं, जो बोलते हैं वही इतिहास होता है|” इतिहास बनाने के लिए या फिर इतिहास में प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिए कई बार बहुत कुछ गलत करना पड़ता है जिसके लिए इतिहास का समय और और आने वाला समय कभी उसे माफ़ नहीं करता| नामवर आज उसी मुहाने पर खड़े हैं जिनके हिस्से मात्र और मात्र विद्रोह और विरोध है | यह इसलिए भी क्योंकि साहित्य जगत में नामवर का बड़ा होना एक सच्चाई है और समस्त साहित्यिक प्रतिमानों पर इनकी ज्यादतियां भी समय की एक सच्चाई है | नामवर के नाम मात्र से कितने ही झोला-छाप प्रोफ़ेसर साहित्य और समाज की गलत व्याख्या करके भारतीय संस्कृति का मखौल उड़ा रहे हैं जबकि उनसे कहीं अधिक योग्यतावान शिक्षक  पक्षपात का शिकार होकर अपने किस्मत को कोष रहे हैं | समय का बदलाव अब आया है और यह बदलाव ही कहा जाएगा क्योंकि इनकी कुनीतियों को बेनकाब किया जा रहा है | इनको अब किसी भी तरह से दबाया नहीं जा सकता और क्योंकि सत्य है तो उस पर अडिग रहने से झुकाया भी नहीं जा सकता| कवि की यह सच्चाई तो देखते ही बनती है----
“यह आदमी कलम का गोलबंदी करता है
एक कलामधारी से दूसरे कलमधारी पर वार करता है
एक बार नहीं हर बार करता है
उसके पिंजरे में बैठा कौआ कोयल को मात करता है
गूंगा भी तानसेन की तरह करामात करता है
उसकी चारण चिट्ठियाँ राष्ट्र की धरोहर हैं
उसका अंगूठा छाप भी
किसी के लिए सफलता की मोहर है
कलम का मशीन में जाना
और कागज़ पर बाहर आना
उसके सुमिरन का प्रभाव है
आज का तो यही स्वभाव है|”8
कवि की दृष्टि में साहित्यिक गुटबंदियां पर जहां आक्रोश व्याप्त है वहीं दिन प्रतिदिन प्रकृति का बनता बिगड़ता संतुलन भी वर्तमान है | कितनी बड़ी विडंबना है जिस हरियाली को सुरक्षित और सुन्दर बनाए रखने के लिए पूर्वजों के हाथों के घट्ठे भी अभी नहीं पुजे उसी हरियाली को उजाड़ कर घर के आँगन में गमले सजाए जा रहे हैं| मनुष्य की कृति में सजावट में प्रकृत के ‘‘फूल नहीं काँटे नहीं” हैं समय के थपेड़े जरूर हैं| उन थपेड़ों को सहने की क्षमता वर्तमान समय के जीवन में कम ही रह गयी है| जहां किन्हीं आशाओं के बुझाते हुए संभावनाओं की एक पूरी दुनिया सामने आ जाया करती थी अब उन्हीं आशाओं एवं संभावनाओं के मध्य ‘मृत जीवन’ थका, हारा नजर आता है|
फूल बगीचों की खुशियाँ, हवेली में लटकती तस्वीरों में,
अख़बार की इस धरती पर, जौहरी हथियारों के खतरे|
सर्द पहाड़ों से मीठी दरिया, दरिया से समंदर के बादल,
बादल के बरसते पानी में, गिरती ये तेजाबी जहरें||
कंकड़ के घरौदों में, इन गमलों की बिसातें कितनी,
गर्म धरती के छीजे चादर से, आते हुए आसमानी खतरे||”9
          स्वयं से दूर होते हुए स्वयं को स्थापित करने की जो जद्दोजहद वर्तमान समाज में मची हुई है सच मानो तो पुरातनता और नवीनता के मध्य का अंतर्द्वंद्व अपने प्रचंड रूप में उपस्थित है| अंतर्द्वंद्व की यह प्रचंडता घर-परिवार के प्रत्येक सदस्य पर हावी है| यह इसी का परिणाम है कि वह प्रत्येक व्यक्ति जिसे कभी अपने समाज और देश में घटित होने वाली घटनाओं से सरोकार होता था आज स्वयं के अस्तित्व को भूल गया है| कवि की दृष्टि में यह अस्तित्व मात्र जीवन को जीने का अस्तित्व नहीं है अपितु दो संस्कृति और दो विचारधाराओं के अंतर्द्वंद्व से उपजे विद्रोह एवं सामंजस्य का अस्तित्व है| “तुम कौन हो मैं कौन हूँ” कविता के माध्यम से कवि सांस्कृतिक अंतर्द्वंद्व का सुन्दर चित्रण प्रस्तुत करता है-
आँचल से ढक के लौ को जलाती हो तुम
पछुवाँ हवा मैं झोंक देता हूँ
पुरवाई की स्वागत में तुम लीपती हो आँगन
चौखट पर खड़ा होकर मैं रोक देता हूँ
तुम कौन हो?
मैं कौन हूँ?
आँगन में तुलसी को सींचती हो तुम
गमले में कैक्टस मैं रोप देता हूँ
आस्था की सफेदी लगाती हो तुम
बुद्धि की कालिख मैं पोत देता हूँ
तुम कौन हो?
मैं कौन हूँ?”10
         पहचान का विलुप्त होना सांस्कृतिक वाग्जाल में उलझना भी हो सकता है और सामाजिक मूल्यहीनता से उपजी संकीर्णता भी| कवि इन दोनों स्थितियों से होकर गुजरता है| वह सांस्कृतिक उलझाव में घिरे मनुष्यों की दयनीय दशा का भी साक्षात्कार करता है और सामाजिक मूल्यहीनता के शिकार हुए मनुष्यों का भी| और सबसे बड़ी बात तो ये है कि यह साक्षात्कार उसके द्वारा उस समय होता है,  “जब कभी इंसान होता” है-
“जब अक्सर ऊब जाता हूँ/
कहीं मैं डूब जाता हूँ/
कहीं फूलों से रूठा/
कहीं कांटों में उलझा/
बहुत परेसान रहता हूँ/
 जब कभी इंसान होता हूँ|”11
         फूलों से रूठना और काँटों से उलझना ये मामूली बात नहीं है| यह सत्य की खोज है और जहां सत्य के खोज का प्रयास होता है वहाँ बनावटीपन नहीं होता| मोह नहीं होता| भावुकता नहीं होती| त्याग होता है, समर्पण होता है| किसी के आकर्षण में बंधकर पिसने का नहीं अपने कर्तव्य और समाज की विसंगतियों में उलझते हुए सत्य को प्राप्त करने के प्रति होता है| कवि समय के शास्वत सत्य को प्राप्त करने में सफल तब होता है जब वह देखता है कि समाज के लोग निहित स्वार्थों के आवरण में ईश्वर को भी नहीं छोड़ रहे हैं| उसके नाम की ज्वाला में खुद तो जल ही रहे हैं सम्पूर्ण मानवीयता को भी जला का राख कर रहे हैं | और यह सब उस ईश्वर के सम्बन्ध में किया जा रहा है-जो शास्वत है, न निराकार है न साकार है-
 “ईश्वर होने का कितना बड़ा प्रपंच
धर्म की ज्वाला कितनी प्रचण्ड
रक्तपात होते हैं
अपने स्वकृत ईश्वर की स्थापना में
जो शास्वत है
न विगत है
न आगत है
गढ़े मूल्यों की परिधि में
विवादी है”12
         यह है अपने समय का कटु यथार्थ | दरअसल देश में इन दिनों कई ऐसे कांड हुए जिनके केंद्र में ईश्वर ही रहा| इन काण्डों के केंद्र में जहां पूर्व प्रचलित ईश्वर के स्थापित मूल्यों को प्रचारित करने का नशा छाया रहा तो बहुत से जगंह स्वयं को ईश्वर के रूप में प्रतिष्ठापित करने की हठधर्मिता भी| इन घटनाओं से जहां जनता-आहत हुई वहीँ राजनीतिज्ञों ने इसका फायदा भी उठाया| इन परिदृश्यों को देखकर और क्योंकि ये घटनाएँ किसी एक दिन की नहीं प्रतिदिन की कहानी हो गयी...फलतः कवि-मन आहत होता है | कवि राजनीतिज्ञों की स्वार्थी नीतियों से भी दो-चार होता है| यह अक्सर कहा जाता है कि कविता राजनीतिज्ञ नहीं होती लेकिन “पिछले दशक में कविता और राजनीति के संबंधों को लेकर काफी बहसें हुई हैं और माना गया है कि आज की प्रतिबद्ध कविता अपने समय की राजनीति से सरोकार रखती है |”13  समकालीन राजनीति ने हृदय से लेकर मस्तिष्क तक को प्रभावित और आंदोलित किया है| कहने को तो प्रजातंत्र है; जनता द्वारा चुना गया जनता का राज; लेकिन व्यवहार में निरंकुश जंगल राज है| यहाँ हर कोई छला जाता है| लूटा जाता है | लूटने और छलने की स्थितियां देखकर कवि हैरान है और जानना चाहता है कि-
“सत्य का चेहरा क्यों सत्य से इतना अलग है
झूठ का मुकुट और झूठ का नग है
किसी कोने से झांकता कोई ठग है
सच के मोती को झूठ के धागों में पिरोकर
क्यों? सच, सत्य से बिलकुल अलग है|”14   
यहाँ के लोकतंत्र में बोला कुछ जाता है और किया कुछ जाता है| होता कुछ है और दिखाया कुछ जाता है| सबकुछ इतना झूठ और फौरेब के आवरण में पिरोया गया होता है कि अंततः स्वीकार कवि को यह भी करना पड़ता है कि-
कितने तुम्हारे चोंचले नये 
कि हम तो काम से गये
तुम और तुम्हारे सत्य नये—नये
विचार का संदूक खोलकर
खुद बंद हूँ....
समृद्धि की हवाओं से
कंगाल होता जनतंत्र हूँ|”15
     जनतंत्र कंगाल है फिर यहाँ के निवासी उससे बड़े कंगाल | ‘जैसी राजा वैसी प्रजा |’ राजा और राज्य अलग मांगने-खाने में व्यस्त हैं और उसके निवासी अलग व्यस्त हैं अपने जीवन-यापन का विकल्प खोजने के लिए| विकास की बातें आम आदमी की पहुँच से बाहर है क्योंकि उसके विकास की प्राथमिकता सबसे पहले उसकी भूख है| “केवल पूंजीपति अथवा रिश्वत आदि के पैसे के बल पर जीने वाला वर्ग ही अपने जीवन में सम्पन्नता पता है | दिन प्रतिदिन बढती मंहगाई, कारों का बोझ, भ्रष्ट शासन-तंत्र तथा नौकरशाही की अकर्मण्यता, जनता के कष्टों को और भी बढाती हुई जीवन जीने की स्थितियों को विषमतर बनाती जा रही है | इस स्थिति में सामान्य आदमी अपने को अत्यंत कष्टदायक, दारुण स्थिति में फंसा पाता है | यदि आदमी कहीं से पैसा जुटा भी लेता है, तो उसके लिए सामान्य सी राशन-पानी की वस्तुएं भी दुष्प्राप्य हैं |”16  अनिल कुमार शर्मा की कविताओं में भी यही कटु यथार्थ है जो इन्हें अपने समय का कवि होने के का बार-बार एहसास कराता है | फाइलों का बनना, भाषण का होना और जनता का एकत्र होकर उसे सुनना, कुछ न प्राप्त होने की स्थिति में आत्महत्या तक को मजबूर हो जाना ही वर्तमान समय की सच्चाई हो गयी है| कवि राजनीतिक षड्यंत्रों में शामिल राजनीतिज्ञों की चारुता प्रिय कुनीतियों को कितने सुन्दर तरीके से अभिव्यक्त करता है कि आज के राजनीतिज्ञों के जो हाथ जनता के दुखती रगों को सहलाते हैं, उनके स्वार्थ ही होते हैं जनता के दुःख नहीं-
यहाँ राजनीति के पंजे
चंगुल बन करुणा के जाल बिछाते हैं
एक चोट को दूसरी चोट से सहलाते हैं
ईश्वर के होने और न होने के मध्य
सवाल का दायरा इतना बड़ा है कि
यहाँ भूंख का कोई हल नहीं|”17  
यह अनिल कुमार शर्मा की खूबी कही जाए या फिर साहित्यिक सामाजिक एवं राजनीतिक सरोकारों के प्रति उनकी अपनी प्रतिबद्धता; समय-समाज में विद्यमान विसंगतियों से परिपूर्ण मानवीय व्यवहारों का बड़ी तल्लीनता से खबर लेते हैं | सत्य को हर हाल में दिखाने का प्रयत्न करते हैं | निःसंदेह ऐसा प्रयत्न साहित्यिक क्षेत्र में कम ही देखने को मिलता है लेकिन जिसने किया मनीषियों द्वारा नवीन धारा का सूत्रपात उसे ही घोषित किया गया | सत्य कहने की क्षमता कवियों में होती है क्योंकि वे सत्य के हिमायती होते हैं | यहाँ एक बात अवश्य समझने की आवश्यकता है कि अब वह समय भी नहीं रहा...किसी को रोते या बिलखते देखकर अपना कवि हृदय उसे अर्पण करदें...अब समय उन आँसुओं के पहचान की है क्योंकि रोने वालों में से अधिकांश घडियाली आंसू बहा रहे हैं| इनकी पहचान आवश्यक है | कवि अनिल कुमार शर्मा का कवि-हृदय इस लिए भी प्रसंशनीय है कि वे इन आसुओं की पहचान करते हैं और घडियाली आँसू बहाने वालों का चुन-चुन कर खबर लेते हैं |




























सन्दर्भ-संकेत-
      1.      शर्मा, अनिल कुमार, कंगाल होता जनतंत्र, दिल्ली, विकल्प प्रकाशन, 2015, पृष्ठ-32
      2.      वही, पृष्ठ-51
      3.      वही, पृष्ठ-114
      4.      वात्स्यायन, सच्चिदानन्द, युगसंधियों पर, (राजनैतिक संस्कृति और सामाजिक संस्कृति) दिल्ली : सरस्वती विहार, 1981, पृष्ठ-100
      5.      शर्मा, अनिल कुमार, कंगाल होता जनतंत्र, दिल्ली, विकल्प प्रकाशन, 2015, पृष्ठ-114
      6.      शर्मा जी यह भूल जाते हैं कि नामवर जी ने अपनी इस भूल को समझा और उसके तुरंत बाद रामचंद्र शुक्ल के तीसरे ग्रन्थ को सम्पादित किया और एक लम्बी खूबसूरत भूमिका लिखी| जब राजेंद्र यादव और दलित लेखकों ने तुलसी पर आक्रमण करना शुरू किया तो नामवर सिंह ही तुलसी के पक्ष में खड़े हुए और यहाँ तक कहा कि तुलसी के बिना हिंदी साहित्य खड़ा ही नहीं हो सकता| तुलसी और कबीर का मूल्यांकन “असली को असली से ही बाँट दो” के लिए नहीं बल्कि उनके मूल स्वर को पकड़ने के लिए किया जाता है| (वही, पृष्ठ-20)
      7.      शर्मा, अनिल कुमार, कंगाल होता जनतंत्र, दिल्ली, विकल्प प्रकाशन, 2015,पृष्ठ-55-56
      8.      वही, पृष्ठ-56-57
      9.      वही, पृष्ठ-40
    10.    वही, पृष्ठ-39
    11.    वही,  पृष्ठ37
    12.    शर्मा, अनिल कुमार, कंगाल होता जनतंत्र, दिल्ली, विकल्प प्रकाशन, 2015, पृष्ठ-39
    13.    तिवारी, विश्वनाथप्रसाद, समकालीन हिन्दी कविता, नई दिल्ली, राजकमल प्रकशन प्रा. लि., पृष्ठ-200, १९८२ 
    14.    शर्मा, अनिल कुमार, कंगाल होता जनतंत्र, दिल्ली, विकल्प प्रकाशन, 2015, पृष्ठ-100
    15.    वही, पृष्ठ-101
    16.    सिंह, डॉ० पुष्पपाल, समकालीन हिंदी कहानी, समकालीन हिंदी कहानी-साहित्य समालोचना ग्रंथमाला-1, चंडीगढ़, हरियाणा साहित्य अकादमी, 1987, पृष्ठ-39   
    17.    शर्मा, अनिल कुमार, कंगाल होता जनतंत्र, दिल्ली, विकल्प प्रकाशन, 2015, पृष्ठ-99