Sunday, 11 September 2016

उसकी सूरत कविता की झरबेरी में
लिपटी हुई  हिंदी की तरह है
मुँह में करैली जैसी आलोचना है
हाथ में कलम के बजाय कोंचना है
सौंदर्य में कृत्रिम भाषा बिलोरना है
वह तो एकांकी में  चिल्लाता है
रेखा चित्र में दाल भात खाता है
जुगाड़ी पत्रिकाओं के कालम में
दिन में उल्लू की तरह इतराता है
निराला का  चाचा मुक्तिबोध का
 कुछ और रिस्ते में खुद को पाता है
इस धुंध में बेहद प्रगतिशील है
खाली आसमान में उड़ता चील है
पुरस्कार पर झपट्टा मारता है
नियत में कुछ ज्यादा  रंगीन है
यह आदमी बड़ा संगीन है
अनिल कुमार शर्मा
११/०९/२०१६



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