Sunday, 4 September 2016

इस जगत मिथ्या में
ब्रह्म सत्य की तलाश है
ज्ञान बुद्धि सब खलास है
छाया को छाया से काटता हूँ
माया में माया से भागता हूँ
एक नींद से दूसरी नींद में जागता  हूँ
मृगतृष्णा के पीछे  भागता हूँ
किसी  सत्य के कोने में झाँकता हूँ
सद्गुरु की चरणधूलि चाटता हूँ
शरीर के भीतर आत्मा है
और देखता हूँ
उस आत्मा का खात्मा  है
गज़ब का परमात्मा है
कई दुकानों में सजता है
तमाम भाषाओ में बजता है
हर जगह वही लगता है
मायाजाल के   भीतर और
इन संकल्पनाओं  के बाहर 
फिर वही दुनिया है
मुन्ना है और मुनिया है
विचित्र मायाजाल है
एक तुरुप चाल है
ज्योति जलती है
फिर बुझती है
अंधेरों की तरकीब सूझती है
समझते रहो समझाते रहो
सिद्धान्तों में उलझाते रहो
वह तो स्वघोषित सच्चे आदमी की तरह
सतरंगा झूठ बोलता है
अतिन्द्रिय बाज़ीगरी की दुकान खोलता है
आत्मा परमात्मा को तोलता है
ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या बोलता है
अनिल कुमार शर्मा
04/09/2016



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