इस जगत मिथ्या में
ब्रह्म सत्य की तलाश है
ज्ञान बुद्धि सब खलास है
छाया को छाया से काटता हूँ
माया में माया से भागता हूँ
एक नींद से दूसरी नींद में जागता हूँ
मृगतृष्णा के पीछे भागता हूँ
किसी सत्य के कोने में झाँकता हूँ
सद्गुरु की चरणधूलि चाटता हूँ
शरीर के भीतर आत्मा है
और देखता हूँ
उस आत्मा का खात्मा है
गज़ब का परमात्मा है
कई दुकानों में सजता है
तमाम भाषाओ में बजता है
हर जगह वही लगता है
मायाजाल के भीतर और
इन संकल्पनाओं के बाहर
फिर वही दुनिया है
मुन्ना है और मुनिया है
विचित्र मायाजाल है
एक तुरुप चाल है
ज्योति जलती है
फिर बुझती है
अंधेरों की तरकीब सूझती है
समझते रहो समझाते रहो
सिद्धान्तों में उलझाते रहो
वह तो स्वघोषित सच्चे आदमी की तरह
सतरंगा झूठ बोलता है
अतिन्द्रिय बाज़ीगरी की दुकान खोलता है
आत्मा परमात्मा को तोलता है
ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या बोलता है
अनिल कुमार शर्मा
04/09/2016
ब्रह्म सत्य की तलाश है
ज्ञान बुद्धि सब खलास है
छाया को छाया से काटता हूँ
माया में माया से भागता हूँ
एक नींद से दूसरी नींद में जागता हूँ
मृगतृष्णा के पीछे भागता हूँ
किसी सत्य के कोने में झाँकता हूँ
सद्गुरु की चरणधूलि चाटता हूँ
शरीर के भीतर आत्मा है
और देखता हूँ
उस आत्मा का खात्मा है
गज़ब का परमात्मा है
कई दुकानों में सजता है
तमाम भाषाओ में बजता है
हर जगह वही लगता है
मायाजाल के भीतर और
इन संकल्पनाओं के बाहर
फिर वही दुनिया है
मुन्ना है और मुनिया है
विचित्र मायाजाल है
एक तुरुप चाल है
ज्योति जलती है
फिर बुझती है
अंधेरों की तरकीब सूझती है
समझते रहो समझाते रहो
सिद्धान्तों में उलझाते रहो
वह तो स्वघोषित सच्चे आदमी की तरह
सतरंगा झूठ बोलता है
अतिन्द्रिय बाज़ीगरी की दुकान खोलता है
आत्मा परमात्मा को तोलता है
ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या बोलता है
अनिल कुमार शर्मा
04/09/2016
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