Saturday, 7 May 2016

आज इस दहकते हुए समाज में
मैं अपने भीतर के आदमी के खिलाफ हूँ
गुदगुदी तकिया और रंगीन लिहाफ हूँ
नारियल की तरह भीतर कोमल
बाहर रुखा और  बेहद कठोर हूँ
स्वादहीन अनुभूति समेटे हुए
भाषा और शब्द में  चटोर हूँ
कुछ  रस भी  रिसता है
भाव और सन्दर्भ किसका  है?
इस अजीब सी दुनिया में
कितने तरह का संसार पिसता है
रोज रोज कितने चेहरे बदलते है
मरी हुई ज़मीर पर सजते हैं
बनावटी सरोकारों में लिपटकर
पाक साफ और निष्पाप हूँ
आज के इस दहकते हुए समाज में
मैं अपने भीतर के आदमी के खिलाफ हूँ ।
अनिल कुमार शर्मा
08/05/2016



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