आज इस दहकते हुए समाज में
मैं अपने भीतर के आदमी के खिलाफ हूँ
गुदगुदी तकिया और रंगीन लिहाफ हूँ
नारियल की तरह भीतर कोमल
बाहर रुखा और बेहद कठोर हूँ
स्वादहीन अनुभूति समेटे हुए
भाषा और शब्द में चटोर हूँ
कुछ रस भी रिसता है
भाव और सन्दर्भ किसका है?
इस अजीब सी दुनिया में
कितने तरह का संसार पिसता है
रोज रोज कितने चेहरे बदलते है
मरी हुई ज़मीर पर सजते हैं
बनावटी सरोकारों में लिपटकर
पाक साफ और निष्पाप हूँ
आज के इस दहकते हुए समाज में
मैं अपने भीतर के आदमी के खिलाफ हूँ ।
अनिल कुमार शर्मा
08/05/2016
मैं अपने भीतर के आदमी के खिलाफ हूँ
गुदगुदी तकिया और रंगीन लिहाफ हूँ
नारियल की तरह भीतर कोमल
बाहर रुखा और बेहद कठोर हूँ
स्वादहीन अनुभूति समेटे हुए
भाषा और शब्द में चटोर हूँ
कुछ रस भी रिसता है
भाव और सन्दर्भ किसका है?
इस अजीब सी दुनिया में
कितने तरह का संसार पिसता है
रोज रोज कितने चेहरे बदलते है
मरी हुई ज़मीर पर सजते हैं
बनावटी सरोकारों में लिपटकर
पाक साफ और निष्पाप हूँ
आज के इस दहकते हुए समाज में
मैं अपने भीतर के आदमी के खिलाफ हूँ ।
अनिल कुमार शर्मा
08/05/2016
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