Thursday, 5 May 2016

तुम्हारे होठ इस कदर हिलते हैं
जैसे बिखरे हुए गुलाब मिलते हैं
कली चटखती है
रजनीगंधा गमकती है
तुम्हारी निगाहों में कोई
रोशनी चमकती है
प्रकृति की सारी मनोरम छवि
क्यों तुझमे ही समायी है
क्यों तुम्हारे रूप में
मेरे हृदय की ख़ुशी बन आयी है
चिड़िया चहकती है
चमेली महकती है
तेरी सांसों में होकर
मेरी साँस चलती है
इसी तरह मेरे अरमान खिलते हैं
तुम्हारे होठ इस तरह हिलते हैं
जैसे बिखरे हुए गुलाब मिलते हैं ।
अनिल कुमार शर्मा
05/05/2016

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