लमही के घूरे पर उगे कुकुरमुत्ते के साये में
कुछ काशी कुछ केदार कुछ विश्वनाथ पल रहे है
एक परम्परा से दूसरी परम्परा में ढल रहे है
एक विचित्र हिंदी पहनकर चल रहे है
यह हिंदी मुझे उसी तरह आती है
जैसे नई बहू ससुर के आगे शरमाती है
घुँघट में रसमलाई खाती है
भसुर से नहीं छुआती है
रचना के पंख पर बैठकर
आलोचना से पीछा छुड़ाती है
रचना सरस्वती के हाथ में
झंकृत वीणा की उदात्त राग है
आलोचना सरस्वती को ढोता हंस है
नीर -छीर विवेक का सुधी परमहंस है
कला इसी चाल से चलती है
रचना सम्यक आलोचना में पलती है
शाश्वत परम्परा के ये मूल्य हैं
विवेचना इसी सीमा के समतुल्य है
टुकड़े- टुकड़े बटे ज्ञान को
साहित्य एक धागे में पिरोता है
इसी में आदमी पशु से मनुष्य होता है
यही बात लमही के घूरे में सड़ गयी
कुकुरमुत्ते के आँख में रोशनी मर गयी
अब रंगीन चश्मे जेब में है
आदमी का रंग फरेब में है
अब तो रचना में चापलूसी है
चावल में ज्यादा भूसी है
आजादी के बाद की यह पहलौठी है
दूसरी परम्परा को ढोता कोई चौथी है ।
अनिल कुमार शर्मा
२४/०५/२०१६
कुछ काशी कुछ केदार कुछ विश्वनाथ पल रहे है
एक परम्परा से दूसरी परम्परा में ढल रहे है
एक विचित्र हिंदी पहनकर चल रहे है
यह हिंदी मुझे उसी तरह आती है
जैसे नई बहू ससुर के आगे शरमाती है
घुँघट में रसमलाई खाती है
भसुर से नहीं छुआती है
रचना के पंख पर बैठकर
आलोचना से पीछा छुड़ाती है
रचना सरस्वती के हाथ में
झंकृत वीणा की उदात्त राग है
आलोचना सरस्वती को ढोता हंस है
नीर -छीर विवेक का सुधी परमहंस है
कला इसी चाल से चलती है
रचना सम्यक आलोचना में पलती है
शाश्वत परम्परा के ये मूल्य हैं
विवेचना इसी सीमा के समतुल्य है
टुकड़े- टुकड़े बटे ज्ञान को
साहित्य एक धागे में पिरोता है
इसी में आदमी पशु से मनुष्य होता है
यही बात लमही के घूरे में सड़ गयी
कुकुरमुत्ते के आँख में रोशनी मर गयी
अब रंगीन चश्मे जेब में है
आदमी का रंग फरेब में है
अब तो रचना में चापलूसी है
चावल में ज्यादा भूसी है
आजादी के बाद की यह पहलौठी है
दूसरी परम्परा को ढोता कोई चौथी है ।
अनिल कुमार शर्मा
२४/०५/२०१६
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