Sunday, 1 May 2016

समय में जो टिक नहीं सका
उस इतिहास को टिका रहा हूँ
लहकते पेट की मजबूरियां
और स्वप्निल क्रांति का तर्क
सभी दुष्चक्रों को उखाड़ते हुए
क्यों खुद उखड़ गया ?
स्वप्न का  झनझनाना 
और नींद भी अधूरी
विभ्रम और यथार्थ की दूरी
समय और चाल दोनों थके -थके से हैं
विचार और विचारधारा पके -पके से हैं
एक धुंध के बीच स्वप्न चाल चल रहा हूँ
किसी खामोश अतीत में ढल  रहा हूँ
भूख भी वही है चीत्कार भी वही है
बस एक साजिश ही नयी है
नए सवालों के सन्दर्भ भी
पुरानी हाड़ी में पका रहा हूँ
समय में जो टिक नहीं सका
उसे इतिहास में टिका रहा हूँ ।
अनिल कुमार शर्मा
01/05/2016
( सभी को  मई दिवस की शुभकामनाऍ )






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