यह बेतुकी सी जिंदगी
जाने किससे तुक मिलाती है
कितनी उम्मीदें जिलाती है
कुछ रंग और नूर पिलाती है
जिंदगी की वादियों में गुजर रहा हूँ
किसी अप्रत्याशित भय से डर रहा हूँ
खोखले अस्तित्व में कोई मूल्य भर रहा हूँ
इस ज़माने का सच किधर है ?
रंगीन झूठ तो इधर है उधर है
सच पर लगी किसकी नज़र है ?
लिफाफे में भरी यह जिंदगी
जाने किस पते पर जाएगी
कौन सा सन्देश लाएगी
यह उम्र किसको तलाशती है
किसकी तक़दीर तराशती है
अपने ही कुनवे में इस कदर अकेला हूँ
सिर्फ अपनी तक़दीर का खेला हूँ
ऐ जिंदगी ये बता कैसा झमेला हूँ ?
अनिल कुमार शर्मा
27 /04 /2016
जाने किससे तुक मिलाती है
कितनी उम्मीदें जिलाती है
कुछ रंग और नूर पिलाती है
जिंदगी की वादियों में गुजर रहा हूँ
किसी अप्रत्याशित भय से डर रहा हूँ
खोखले अस्तित्व में कोई मूल्य भर रहा हूँ
इस ज़माने का सच किधर है ?
रंगीन झूठ तो इधर है उधर है
सच पर लगी किसकी नज़र है ?
लिफाफे में भरी यह जिंदगी
जाने किस पते पर जाएगी
कौन सा सन्देश लाएगी
यह उम्र किसको तलाशती है
किसकी तक़दीर तराशती है
अपने ही कुनवे में इस कदर अकेला हूँ
सिर्फ अपनी तक़दीर का खेला हूँ
ऐ जिंदगी ये बता कैसा झमेला हूँ ?
अनिल कुमार शर्मा
27 /04 /2016
No comments:
Post a Comment