Saturday, 23 April 2016

प्रेमचंद का कफ़न ओढ़े
साहित्य में कितने घीसू -माधव
अधजला आलू बीन कर खा रहे हैं
बुधिया को प्रसव में तड़पा रहे हैं
यह तो समय का खेल है
दिया में भी नकली तेल है
जलता कम जलाता ज्यादा है
आलोचना का नया प्यादा है
गुल्ली डंडा खेल रहा है
मोटेराम शास्त्री को ठेल रहा है
कहने को बड़ा दानी है
खेल में गलदानी है
दूध में पानी है
प्रेमचंद का फटा जूता सी रहा है
लमही के घूरे पर जी रहा है
अब ये नए तीर्थ पर जा रहे है
प्रेमचंद का कफ़न ओढ़े
साहित्य में कुछ घीसू - माधव
 अधकचा आलू खा रहे हैं
अनिल कुमार शर्मा
23/04/2016





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