Sunday, 24 April 2016

उन सपनों का क्या हुआ
जो देखे गए थे
 कुछ हमारे लिए
कुछ तुम्हारे लिए
नींद पूरी होने से पहले ही
वे टूट गए, फुट गए
सपनों की विरासत लूट गए
अब तो बाजार में सपने बिकने लगे है
तमाम प्रचार में दिखने लगे है
अब  सपने दीखते नहीं है
सिर्फ दिखाए जाते है
किसी अबूझ किताब में लिखी
किस्मत की तरह लिखाए जाते है
पहेली की तरह बुझाए जाते है
हमारे पेटों  से असली  भूख निकालकर
बनावटी नकली भूख से सजाए जाते है
छोटे अबोध बच्चों की तरह हमलोग
सपनो के झुनझुने से बझाए जाते हैं ।
अनिल कुमार शर्मा
24/04/2016



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