Wednesday, 20 April 2016

मित्र जो तुम्हारे मन में है
क्या उसे उसी तरह कह दोगे
कहकर क्या  जिन्दा  रह लोगे
 मैं तो कफ़न में से बोल रहा हूँ
कब्र में जिंदगी टटोल रहा हूँ
कुछ कटे   हुए अब  हाथ है
कुछ बँधे हुए से  पाँव है
ये थके थके से गांव है
जहाँ रोज कोई जिंदगी मरती है
विकास के दानव से डरती है
लोकल विलेज को ग्लोबल विलेज खा रहा है
मेरा देश किधर से किधर जा रहा है
इस नरक  का  ग़ज़ल  कौन गा रहा है
अब तो कान पक गए हैं
इस चमक में फटे पांव ढक गए हैं
खेतों में मौत की फसल उग रही है
चमकती अर्थव्यवस्था जिंदगी चुग रही है
 लगता है कोई कस्ती डूब रही है|
अनिल कुमार शर्मा
20/04/2016






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