Friday, 3 June 2016

आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा कोई बेईमान चेहरा
 मंच पर जब  ईमानदारी की बात करता है
तो लगता है इस  कोढ़ में कोई खाज पलता है
वे सुनाते है हम गूंगे बहरों की तरह सुनते है
अपने माननीय को बड़ी शिद्दत से चुनते है
व्यक्ति से ज्यादा अपराधी कहीं  व्यवस्था है
उदार होते  विश्व  की अब यही अवस्था है
पेट के साँचे के बाहर  यह भूख की दुनिया
गोदाम से निकलकर शोरूम में सज रही है
विज्ञापन के रंगीन  संगीत में बज रही है
जमीन छोड़कर कोई जमीन बनाने की  जुगत है
विदीर्ण होते परिवेश के नरक में यही भुगत है
अपने सर पर जब अपनी ही बनायीं  छत  गिरती है
खुद की संगीन जब अपने सीने को चीरती है
अपने बचाव में बनाए गए सभी हथियार
जब उलटकर  खुद अपने पर ही चलते है
तब हम किसी  क्रांति के साँचे में ढलते है
जब व्यक्ति और समाज का ढांचा
मूल्यहीन सत्ता के बोझ से चरमराता है
व्यवस्था का ढूह  टूटन में भरभराता है
जिंदगी के कोने में कोई उम्मीद जगती है
टूटे हुए साज पर कोई नयी राग बजती है
खंडहर में कोई नयी इमारत सजती है ।
अनिल कुमार शर्मा
०३/०६/२०१६















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