देश का दुःख
और विदेश का सुख
समस्याओं के उबलते कड़ाही में
कुछ तो छन रहा है
मेक इन इंडिया बन रहा है
देश तुम दुकानदारों के लायक बनो
निवेश के लिए मंगलदायक बनो
जिंदगी के ऊपर जहर की तरह
मड़राती हुई भूमंडलीकरण की दुनिया
उपभोक्ता और उपभोग के बाजार में
नए तरह के रचे हुए संसार में
पहाड़ों का धंसना और सागर का उफनना
जंगलों का कटना और नदियों का सूखना
अब परिवेश के दर्द को कौन समझेगा?
विनाश के राह पर विकास का कारवां
चेहरा शून्य आदमी की तलाश में
यह भीड़ किधर जा रही है ?
किस परिवेश का गीत गा रही है ?
अनिल कुमार शर्मा
05/06/2016
और विदेश का सुख
समस्याओं के उबलते कड़ाही में
कुछ तो छन रहा है
मेक इन इंडिया बन रहा है
देश तुम दुकानदारों के लायक बनो
निवेश के लिए मंगलदायक बनो
जिंदगी के ऊपर जहर की तरह
मड़राती हुई भूमंडलीकरण की दुनिया
उपभोक्ता और उपभोग के बाजार में
नए तरह के रचे हुए संसार में
पहाड़ों का धंसना और सागर का उफनना
जंगलों का कटना और नदियों का सूखना
अब परिवेश के दर्द को कौन समझेगा?
विनाश के राह पर विकास का कारवां
चेहरा शून्य आदमी की तलाश में
यह भीड़ किधर जा रही है ?
किस परिवेश का गीत गा रही है ?
अनिल कुमार शर्मा
05/06/2016
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