Thursday, 9 June 2016

तुम फूल की तरह हंसती हो
मैं कांटो की तरह चुभता हूँ
तुम कविता  की तरह गूंजती हो
मैं किसी गद्य की तरह ऊबता हूँ
तुम शीतल चांदनी की तरह फैलती हो
मैं गरम  सूरज की तरह डूबता हूँ
हवा की खुशबू में तुम्हारी महक मिलती है
पक्षी के चहकने में तुम्हारी चहक मिलती है
अँधेरे में रोशनी सी तुम्हारी झलक मिलती है
भोर में जैसे कोई चम्पा की कली खिलती है
मंद समीर सी जब तुम्हारी स्पर्श मिलती है
जैसे तपती  धरती पर बारिश की बूँद गिरती है
और आकाश में सावन की घटा घिरती है
स्वाति की बूँद जैसे पपीहा को मिलती है
सीप में जैसे कोई मोती बनती है
दिल में  गीत की तरह तुम  बजती हो
वीरान में किसी बाग सी सजती हो
अनिल कुमार शर्मा
09/06/2016






No comments:

Post a Comment