Monday, 13 June 2016

यह देश लगभग सत्तर साल का बच्चा है
कुछ पका  तो अभी कुछ कच्चा है
हमारी जाति का गुंडा
तुम्हारी जाति के गुंडे से अच्छा है
जनता जनता से कहती है
जनता जनता से सुनती है
मन ही मन बहुत कुछ गुनती है
अपनी जाति   अपना  जनादेश है
एक विचित्र बहुमत का सन्देश है
इसमें राधा और घनश्याम है
दुर्वासा और परशुराम है
शास्त्रों में ब्राह्मणवाद है
संविधान में दलितवाद है
मनुवादी और अम्वेडकरवादी है
कही पर तो आतंकवादी है
सहमे सहमे  से गांधीवादी हैं
शहरो में पूंजीवादी हैं
जंगलों में नक्सलवादी हैं
संस्कृति उपभोक्तावादी है
सभ्यता अतिवादी हैं
संत हाईटेक हैं
कितने तो दिलफेंक है
इसी तरह हम बन रहे हैं
अपने सीने पर तीर की तरह तन रहे हैं
अनिल कुमार शर्मा
13/06/2016

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