Thursday, 30 June 2016

आदमियों के भीड़ में
एक टुकड़ा आदमी खो गया
 सिर्फ आदमी छोड़कर
वह बहुत कुछ हो गया
विज्ञानं के चकाचौंध शहर में 
राजनीति के खण्डहर में
विकास के ज़हर में
खुद के बनाए घर में
बेघर की तरह रहता है
स्वयं  को सहता है
खुद को खुद से कहता है
अब तो सब की दबी ज़बान है
तीर और कमान है
जो खुद को बेधता है
हवा में कुछ फेंकता है
भगवान बनने की ख्वाहिश में
अंदर के आदमी को मारता है
सद्भावनाओं को फाड़ता है
आदमियत  काढता है
नए पाखण्ड में ढालता है
अनिल कुमार शर्मा
01/07/2016




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