आदमियों के भीड़ में
एक टुकड़ा आदमी खो गया
सिर्फ आदमी छोड़कर
वह बहुत कुछ हो गया
विज्ञानं के चकाचौंध शहर में
राजनीति के खण्डहर में
विकास के ज़हर में
खुद के बनाए घर में
बेघर की तरह रहता है
स्वयं को सहता है
खुद को खुद से कहता है
अब तो सब की दबी ज़बान है
तीर और कमान है
जो खुद को बेधता है
हवा में कुछ फेंकता है
भगवान बनने की ख्वाहिश में
अंदर के आदमी को मारता है
सद्भावनाओं को फाड़ता है
आदमियत काढता है
नए पाखण्ड में ढालता है
अनिल कुमार शर्मा
01/07/2016
एक टुकड़ा आदमी खो गया
सिर्फ आदमी छोड़कर
वह बहुत कुछ हो गया
विज्ञानं के चकाचौंध शहर में
राजनीति के खण्डहर में
विकास के ज़हर में
खुद के बनाए घर में
बेघर की तरह रहता है
स्वयं को सहता है
खुद को खुद से कहता है
अब तो सब की दबी ज़बान है
तीर और कमान है
जो खुद को बेधता है
हवा में कुछ फेंकता है
भगवान बनने की ख्वाहिश में
अंदर के आदमी को मारता है
सद्भावनाओं को फाड़ता है
आदमियत काढता है
नए पाखण्ड में ढालता है
अनिल कुमार शर्मा
01/07/2016
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