बुद्धिधंधी
ज्ञान के कतरन को विचार में लपेटकर
उसी दही में पानी डालकर मथनी को फेंटता है
दूध और दही को परिभाषित करने में
किसी नए गधे की तरह रेंकता है
यह जो आदमी है
एक क्रमबद्ध इतिहास है
एक अजीब गले की फांस है
स्मृतिओं के जाल में फँसी घटनाओं की व्याख्या
जहाँ से देखो वही से शुरू होती है
जेहन में कोई नयी आग बोती है
जंगल से निकल कर गांव और शहर में बसना
परिवेश को जहरीली तकनीकियों से डँसना
खाने के लिए पकवान भरी थाली है
विज्ञानं और दर्शन की जुगाली है
जमीन पर होते हुए ज़मीन से उठता है
आसमान में ताकते हुए ज़मीन को लूटता है
सत्ता की जाल में फँसी ज्ञान -विज्ञानं की व्यवस्था
ये बता कि सत्ता का विकल्प क्या है?
आदमी तुम्हारा संकल्प क्या है ?
तर्कजाल और विश्वासजाल के फंदे अजीब हैं
इसी में कुछ खुशनसीब तो कुछ बदनसीब है
विकास के सपने और हक़ीक़त में कुछ मंदी है
खेमे के ऊपर खेमे और बेहतर गोलबंदी है
अजीब तरह का खेल खेलता बुद्धिधंधी है ।
अनिल कुमार शर्मा
10/06/2016
ज्ञान के कतरन को विचार में लपेटकर
उसी दही में पानी डालकर मथनी को फेंटता है
दूध और दही को परिभाषित करने में
किसी नए गधे की तरह रेंकता है
यह जो आदमी है
एक क्रमबद्ध इतिहास है
एक अजीब गले की फांस है
स्मृतिओं के जाल में फँसी घटनाओं की व्याख्या
जहाँ से देखो वही से शुरू होती है
जेहन में कोई नयी आग बोती है
जंगल से निकल कर गांव और शहर में बसना
परिवेश को जहरीली तकनीकियों से डँसना
खाने के लिए पकवान भरी थाली है
विज्ञानं और दर्शन की जुगाली है
जमीन पर होते हुए ज़मीन से उठता है
आसमान में ताकते हुए ज़मीन को लूटता है
सत्ता की जाल में फँसी ज्ञान -विज्ञानं की व्यवस्था
ये बता कि सत्ता का विकल्प क्या है?
आदमी तुम्हारा संकल्प क्या है ?
तर्कजाल और विश्वासजाल के फंदे अजीब हैं
इसी में कुछ खुशनसीब तो कुछ बदनसीब है
विकास के सपने और हक़ीक़त में कुछ मंदी है
खेमे के ऊपर खेमे और बेहतर गोलबंदी है
अजीब तरह का खेल खेलता बुद्धिधंधी है ।
अनिल कुमार शर्मा
10/06/2016
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