Wednesday, 14 December 2016

मैं तो  अँधेरे में जी रहा था
टिमटिमाती ढिबरी के सहारे
उसने मेरी झोपड़ी में
आग लगाकर रोशनी कर दी
अब मैं बेसहारा बन कर
इस रोशनी में जल रहा हूँ
नमक की हाड़ी की तरह
जाड़े में  गल रहा हूँ
जौ तो साबुत बचे हुए हैं
जो घुन है पिस रहे है
 यह जो डिजिटल चक्की है
कोई  साज़िश पक्की है
दिवंगत होती मुद्राओं के श्राद्ध में
कितने कतारों में दिवंगत हुए
प्रश्न की परिधि में पूँजी की चाल है
देश में   बिछायी गयी कोई जाल है
मैं स्वयं की परिधि से वंचित हूँ
हवा पीते हुए भूख में संचित हूँ
मेरी लक्ष्मी अनर्थव्यवस्था में बंद है
व्यवस्था से आती कोई दुर्गन्ध है
खाता -बही में  तो समृद्ध हूँ
हक़ीक़त में  कंगाल हूँ
मुफ़लिसी में नोचता बाल हूँ
अनर्थशास्त्रियों के ज्ञान से
हो गया ख़स्ता -हाल हूँ
वित्त वंचित इंसान हूँ ।
अनिल कुमार शर्मा
14/12/2016






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